Aadarsh Rathore

Aadarsh Rathore

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10/04/2026

क्या गलू के मेले और हराबाग शिव मंदिर का हरनाला, शानन, पचांगणा और हार गुनैण जैसे नामों से कोई नाता है?

“जोगिंदर नगर के हराबाग में मिले प्राचीन शिव मंदिर के हिस्से”- जब से होश संभाला, हर चार से पांच सालों में ये खबर पढ़ने को मिलती। सोशल मीडिया के दौर में तो हर दो साल में यह खबर देखने को मिलने लगी। जब कभी कोई आसपास की झाड़ियों की सफाई करता, कुछ खंडहरों से पूरे हराबाग और आसपास के इलाक़ों का इतिहास झांकने लगता। कुछ दिन तक चर्चा होती, मगर झाड़ियां फिर उग आतीं। इसके साथ ही इतिहास के वो पन्ने भी फिर से बंद हो जाते।

करीब 15-16 साल पहले हराबाग में एक शादी में बैठा था, तो कुछ लोग उस मंदिर के बारे में बात कर रहे थे। किसी ने बताया कि 1905 से पहले ये मंदिर अच्छी स्थिति में था, मगर भूकंप ने ऐसी तबाही मचाई कि पूरी तरह ढह गया। हुआ भी होगा। 1905 वो साल था, जब कांगड़ा घाटी में आए भूकंप ने वर्तमान जोगिंदर नगर और गुम्मा से होते हुए मंडी तक तबाही मचाई थी। कई मकान और मंदिर ढह गए, असंख्य लोग मारे गए। हो सकता है, इस इलाक़े में लोगों को इतना नुक़सान हुआ हो कि उन्हें ख़ुद को संभालने में ही कई पीढ़ियां लग गई हों और इस बीच ये मंदिर वहीं उपेक्षित रह गया हो।

हालांकि, एक बात सोचने लायक ज़रूर है कि जब स्थानीय लोगों को पता था कि वहां खंडहर हैं, तो सौ सालों से भी ज़्यादा वक्त में उस पंचायत में किसी को ऐसा नहीं लगा कि हमें मिलकर इस मंदिर को फिर से सही करने के लिए कुछ करना चाहिए? स्थानीय बुज़ुर्ग कहते हैं कि कुछ साल पहले तक वो मंदिर के अवशेषों के बीच प्रांगण में मौजूद जलस्रोत से पानी भरकर घर लाया करते थे। लेकिन दुखद है कि जब घर-घर नल लग गए, तो उस पानी के स्रोत की साफ-सफाई की सुध लेना भी छोड़ दिया गया। खैर, मजबूरियां रही होंगी और इनपर बात करने का मतलब भी नहीं।

बीते नौ महीनों के अंदर कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस मंदिर को चर्चा में ला दिया। सोशल मीडिया पर खबर फैली कि भारी बारिश के बाद हराबाग में प्राचीन मंदिर के खंडहर मिले हैं। हालांकि, मेरे लिए ये कोई नई खबर नहीं थी, मगर एक जिज्ञासा पैदा हुई। मैंने मंडी स्टेट के इतिहास को टटोलना शुरू किया कि कहीं इस मंदिर का कोई ज़िक्र तो नहीं। कुछ किताबें पढ़ीं, उनमें कहीं ज़िक्र नहीं मिला, तो गैज़ेटियर पढ़े, फिर कनिंगम की एएसआई की पंजाब और राजपूताना की टूर रिपोर्ट पढ़ी। वहां भी इसका उल्लेख नहीं मिल पाया। हो सकता है, मुझसे ही छूट गया हो, लेकिन मैं उतना ही तलाश पाया, जितना एक आम जिज्ञासु तलाश सकता है।

लेकिन जिक्र न मिलने का अर्थ यह तो नहीं है कि इस मंदिर का महत्व नहीं है। कांगड़ा से लेकर मंडी तक जोगिंदर नगर होते हुए जो पूरी बेल्ट है, वहां शैव परंपरा का प्रभाव रहा है। यहां काफ़ी पुराने मंदिर हैं, जिनमें से कुछ तो अंग्रेज़ों के सर्वे और रिपोर्टों में जगह पा सके, लेकिन कुछ नहीं। जैसे कि नेर (मझारनू) के श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर और गुम्मा के शिव मंदिर का भी ज़्यादा कहीं ज़िक्र नहीं मिलता। फिर भी, इतना कुछ पढ़ने के बाद कुछ बातें स्पष्ट हुईं कि हराबाग, हारगुनैण, शानन और पंचांगणा जैसी आसपास की जगहों के नामों में कुछ तो समानता है। इसकी बात आगे करता हूं।

इस बीच मैंने गूगल मैप्स से इस मंदिर के हिस्सों की तस्वीरें निकालीं, जो किसी स्थानीय युवा ने अपलोड की थीं। मैंने उनके कलर प्रिंट निकालकर एएसआई को चिट्ठी भेजी और आग्रह किया कि इस मंदिर का सर्वे किया जाए और इसे मूल स्वरूप में लाने की कोशिश की जाए। इस बीच, मैंने देखा कि स्थानीय युवाओं ने भी प्रशासन को ज्ञापन दिया है कि मंदिर का जीर्णोद्धार किया जाए और एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) आकर काम संभाले। बहरहाल, चिट्ठी के साथ भी वही हुआ, जो ज्ञापनों के साथ होता है। न कोई जवाब आया, न कोई क़दम उठाया गया।

फिर एक दिन इंस्टाग्राम फीड पर एक रील दिखी, जिसमें जेसीबी मशीन पत्थरों के ढेर हटाती दिखी। देखा कि नाज़ुक, घड़े हुए पत्थरों से बनी इस ऐतिहासिक जगह पर जेसीबी जैसी भारी-भरकम मशीन इस्तेमाल की जा रही है। इससे मैं चौंका। भले लोगों की मंशा अच्छी थी, लेकिन फिक्र हुई कि कुप के कमज़ोर पत्थरों के आपस में रगड़ खाने से उसमें बनी कृतियों को भारी और ऐसा नुक़सान हो सकता है, जिसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता था।

फिर कुछ वीडियो में यह भी देखा कि यह बात कही जा रही है कि इस मंदिर को किसी ने तोड़ा था, जबकि स्थानीय बुज़ुर्ग यह साफ़ बताते हैं कि उन्होंने अपने बड़ों से सुना था कि 1905 के भूकंप में पूरा मंदिर ढह गया था और उससे अंदर की प्रतिमाओं को भारी नुक़सान पहुंचा था। यह भी दिखा कि मंदिर पुनर्निर्माण के लिए किसी पर्सनल अकाउंट में चंदा भी मांगा जा रहा था। यह बात भी अटपटी लगी, क्योंकि हमारे इलाक़े में बहुत सारे मंदिर हैं, जहां गांव के लोगों ने मिलकर सोसाइटी बनाई है और बैंक खाता खोलकर चंदा जुटाकर सुधार और विकास कार्य किए जा रहे हैं। ख़ैर, ये उस गांव के युवाओं और बड़े-बुज़ुर्गों का अपना विषय है कि चंदा कैसे लेना है, कैसे काम करवाना है। मेरी भावना तो इस अनमोल विरासत को दीर्घकालिक नुकसान से बचाने की थी।

इस बीच मैंने प्रशासन को मेल लिखकर आग्रह किया कि कृपया वहां पर अवैज्ञानिक ढंग से हो रहे काम का सुपरविज़न किसी एक्सपर्ट की निगरानी में होना चाहिए, ताकि गलती से भी किसी नाज़ुक ढांचे को नुकसान न पहुंचे। साथ ही, उस जगह को सुरक्षा देने का भी आग्रह किया। डर यह था कि वहां निकलने वाली प्रतिमाओं और अन्य ऐतिहासिक वस्तुओं को मूर्ति तस्कर न चुरा लें। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हिमाचल के प्राचीन मंदिरों से असंख्य कृतियां चुराई जा चुकी हैं।

उसी दौरान मैंने एएसआई के शिमला सर्कल और दिल्ली में बैठने वाले महानिदेशक को भी इस बाबत ईमेल किया कि कृपया हरकत में आएं, मंदिर का सर्वे करें और वैज्ञानिक ढंग से दबे हुए हिस्सों को निकालकर मंदिर को उसी स्वरूप में बनाने की कोशिश करें, जैसा वह पहले रहा होगा। जब उस पर प्रतिक्रिया नहीं आई, तो केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, हिमाचल प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्री मुकेश अग्निहोत्री, उनके विभाग, मंडी की सांसद कंगना रनौत और हिमाचल के राज्यसभा सांसदों को भी ईमेल भेजकर आग्रह किया कि एएसआई और संस्कृति मंत्रालय को हरकत में लाया जाए।

मैंने वह कोशिश की, जो अपनी आस्था, अपनी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास के प्रति संवेदनशील हर व्यक्ति को करनी चाहिए। मगर फिर सुनने को मिला कि यह प्रचारित किया गया कि किसी “धर्म विरोधी, किसी नास्तिक, किसी राजनीतिक व्यक्ति, किसी सनातन के शत्रु” ने काम रुकवा दिया, जो कि सच नहीं था। कोई स्टे तो लगा नहीं था। मंदिर स्थल पर लोगों का आना-जाना लगा रहा, वहां भंडारे हुए, पूजा की गई और शिवलिंग भी स्थापित हुआ। फिर मुझे एक मित्र ने बताया कि अधिकारी मेरी ईमेल का हवाला देकर काम रोकने की बात कर रहे हैं, तो मैंने दोबारा ईमेल भेजकर आग्रह किया कि यदि सरकार पुनरोद्धार करने में सक्षम नहीं है, तो लोगों को काम करने से क्यों रोका जा रहा है। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि एएसआई या अन्य महकमे कभी हरकत में न आएं और जो लोग इस मंदिर को फिर पुराने स्वरूप में लाना चाहते हैं, उन्हें भी काम न करने दिया जाए।

वैसे तो विभिन्न कानूनों के तहत यह प्रशासन की ही ज़िम्मेदारी है कि किसी भी धरोहर को संरक्षित करे, मगर हमारे नेताओं और सरकार की उदासीनता खलती है। मेरी भावना यह रही है कि एक्सपर्ट्स की निगरानी में मंदिर फिर से अपने पूरे वैभव के साथ अस्तित्व में आए। सरकार एक शोध करे कि क्या किसी सर्वे या रिपोर्ट में इस मंदिर जिक्र है। कार्बन डेटिंग जैसी तकनीकों से मंदिर का सही इतिहास निकाला जाए और बताया जाए कि मंदिर कब बना।

इस बीच अच्छी खबर यह है कि हिमाचल के प्रदेश के कला एवं संस्कृति विभाग की एक चिट्ठी मुझे मिली है, जिसमें उन्होंने उस पत्र की कॉपी भेजी है, जो उन्होंने एएसआई को लिखा है और इस मंदिर की सुध लेने का आग्रह किया है। मगर एएसआई आए, न आए, इसकी कोई गारंटी नहीं। स्थानीय नेताओं, विधायकों को इस मामले में आवाज़ उठानी चाहिए और उन लोगों का साथ देना चाहिए, जो चाहते हैं कि ये मंदिर फिर से बने। लेकिन अफ़सोस, संस्कृति और धरोहर के लिए स्थानीय लोगों ने जितना उत्साह दिखाया, उसका रत्ती भर भी न तो प्रशासन में दिखा, न हमारे नेताओं में।

मैं कोई विशेषज्ञ नहीं, मगर ऐसा लग रहा है कि इस जगह का इतिहास मात्र उस मंदिर तक सीमित नहीं है। आज़ादी से पहले की मंडी स्टेट का हराबाग परगना एक अहम जगह थी। मगर मेरे मन में सवाल कौंध रहे हैं कि हराबाग क्या ‘हर’ यानी शिव का ‘बाग’ है? हारगुनैण क्या ‘हर गौं’ यानी ‘शिव के गांव’ का बदला हुआ स्वरूप है? क्या ‘शानन’ उस ‘स्नान’ का अपभ्रंश है, जो इस मंदिर के प्रांगण के जल स्रोत में होता रहा होगा- वैसा ही पवित्र स्नान, जैसा कि पास के ही नागचला में होता है? क्या गांव ‘पचांगणा’ शब्द शिव के ‘पंचानन’ नाम का बदला हुआ स्वरूप है? इन पर शोध कोई विशेषज्ञ ही तो कर सकता है न?

यह मंदिर आसपास के पुराने शिव मंदिरों से अलग है। अन्य मंदिरों के गर्भगृहों में शिवलिंग स्थापित है, मगर इस मंदिर में प्रतिमा थी, जिसे भैरव-भैरवी की प्रतिमा बताया जा रहा है। भैरव भगवान शिव के रौद्र स्वरूप माने जाते हैं और तांत्रिक परंपरा में शिव-शक्ति को भैरव-भैरवी के रूप में पूजा जाता है। इस तरह के मंदिर देश में कम ही हैं। इसलिए भी इस मंदिर का महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। क्या पता, गलू में होने वाला मेले और इस मंदिर में भी कोई रिश्ता हो। ये भी संभव है कि गलू मेले का इतिहास सुक्राह्ट्टी (जोगिंदर नगर) के मेले से भी प्राचीन हो। वैसे एक लोकगीत भी है- सारा धैड़ा काटया गलू रीया जातरा, रात पेई गुम्मे रे नाला (सारा दिन गलू की जातर में काटा और लौटते हुए गुम्मे के नाले में रात पड़ गई)। और भी सुंदर बात यह है कि हराबाग मंदिर में निकली प्रतिमाओं में कुछ ऐसी मुख आकृतियां हैं, जो हमारी चौहार घाटी के देवताओं के मोहरों से मेल खाती हैं। इनमें कोई सम्बंध है या नहीं, इसका पता तो शोध पर ही चल सकता है।

बहरहाल, हम सबकी यही इच्छा है कि मंदिर का सही और सम्मानजनक पुनरुद्धार हो। इसके लिए सामुदायिक समिति, पुरातत्व विभाग और प्रशासन का सहयोग ज़रूरी है। आस्था के साथ-साथ हमारी धरोहर, हमारा इतिहास और उसकी सही कहानी भी बहुत महत्व रखती है। वरना हमने देखा है कि 1905 के भूकंप में ढहे गुम्मा के शिव मंदिर को फिर से बनाने की कोशिश में उसका स्वरूप ही बदल गया है। उस मंदिर के कुछ हिस्सों की मौलिक तस्वीरें आज भी मेरे पास हैं। बहुत साल पहले नेर के लक्ष्मीनारायण मंदिर और बैजनाथ के सिद्धनाथ मंदिर में सुधार के दौरान चूना पोत दिया गया था, जिससे नाज़ुक स्टोन और ज्यादा खराब हो गया था।

हमारे स्थानीय बड़े-बुज़ुर्गों और युवाओं को एक सोसाइटी बनाकर इस मंदिर को इसके मौलिक वैभव के साथ पुनर्स्थापित करने की मुहिम छेड़नी चाहिए, ताकि नेता भी हरकत में आएं। होना तो यह चाहिए था कि स्थानीय प्रशासन खुद इस मामले का संज्ञान लेकर तुरंत संबंधित विभागों को सूचना भेजता और वे विभाग पुनरोद्धार कार्य शुरू करते। सरकार का संस्कृति विभाग सिर्फ मेलों में मनोरंजन के नाम पर भारी-भरकम रकम खर्च करने के लिए नहीं है। उसका दायित्व है हमारी धरोहरों को संभालना।

यही कामना है कि मंदिर ऐतिहासिक स्वरूप में स्थापित हो, लोग दूर-दूर से इसे देखने आएं और हराबाग पर्यटन के मानचित्र पर दमकता दिखाई दे।

रुद्रः प्रचोदयात्

(नीचे मंदिर के अवशेषों की तस्वीर को आसपास के मंदिरों के वास्तुशिल्प को ध्यान में रखते हुए एआई की मदद से रीइमैजिन किया है. कामना है कि मंदिर इसी तरह के किसी मौलिक स्वरूप में बने.)

02/04/2026

जोगिंदर नगर मेले की जलेब में सबसे आगे नाचने वाले युवा कौन हैं? कल सुक्राह्ट्टी के मेले का पहला दिन था। इससे पहले कि आगे बढ़ें, पहले ये समझ लेते हैं कि जलेब का अर्थ क्या होता है। जलेब का मतलब होता है- किसी शाही सवारी के साथ निकलने वाला जुलूस। तो इसी तरह जब कल देव हुरंग नरैण और अन्य देवी-देवताओं की जलेब निकली, तो हर साल की तरह बहुत से युवा पारंपरिक धुनों और गानों पर गाते-थिरकते हुए साथ में बढ़ते दिखे।

अगर आप इन लोगों को देखेंगे तो इन लड़के-लड़कियों में ज़्यादातर की उम्र 20 साल से कम है। अगर और गहराई में जाएंगे तो दिखेगा कि इनमें जोगिंदर नगर और आसपास के लोगों की संख्या 25 फीसदी भी नहीं होगी। तो फिर ये कौन हैं? ये युवा हैं चौहार घाटी के वासी जो बेहतर शिक्षा और अच्छे रोज़गार के लिए ख़ुद को तैयार करने के लिए अपने घरों से दूर यहां जोगिंदर नगर और आसपास के इलाक़ों में रहते हैं। कुछ किराये के मकानों में, कुछ रिश्तेदारों के यहां और हॉस्टल, पीजी वगैरह में।

ये वो लोग हैं, जिन्होंने जोगिंदर नगर कस्बे की इकॉनमी को रफ्तार दी है। स्थानीय व्यापारियों, कारोबारियों की आमदनी में योगदान देने वाली इस युवा पीढ़ी में कई लड़के-लड़कियां वो हैं जो कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं, कुछ वे हैं जो सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे हैं, कुछ सरकारी नौकरियों के लिए प्रेपरेशन कर रहे हैं और कुछ ने नर्सिंग और बीएड में ऐडमिशन लिया है। वे इतने मेहनतकश हैं कि जब फसलों की बुवाई और हारवेस्टिंग का सीज़न आता है तो तुरंत अपनी तैयारी छोड़ गांव जाते हैं, सारे काम करते हैं और फिर लौटकर तैयारियों में जुट जाते हैं।

चौहार घाटी हमारे जोगिंदर नगर से काफ़ी अलग है। भौगोलिक रूप से ही नहीं, सांस्कृतिक रूप से भी। ये फर्क भाषा से लेकर मान्यताओं और रीति-रिवाजों तक में दिखता है। इसकी वजह भी है। द्रंग इलाक़े की इस वैसी को एक वक्त काफी पिछड़ा हुआ इलाक़ा माना जाता था। भौगोलिक पेचीदगियां ही इतनी हैं कि आज भी हर गांव तक सड़क पहुंचाना मुश्किल है। कहीं देवदार के घने जंगल, कहीं खड़ी घाटियां तो कहीं इतनी कम आबादी कि वहां तक सड़क पहुंचाना नेताओं को वोटों के लिहाज से फ़ायदे का सौदा नज़र नहीं आया। और कुछ नेता तो ऐसे रहे, जिन्होंने चाहा कि ये इलाका पिछड़ा रहे, लोग वंचित रहें और उन्हें गुमराह करके वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जाता रहे। ख़ैर, वो अलग विषय है।

इन वजहों से उस घाटी से पलायन भी हुआ। कुछ लोग मंडी में बसे, कुछ पधर, कुछ ने मंडी-पठानकोट हाइवे के किनारे मकान बनाए और एक बड़ा हिस्सा जोगिंदर नगर भी आया। वैसे जोगिंदर नगर सांस्कृतिक रूप से इतना विविधता भरा रहा है कि यहां दूर-दूर से लोग आकर बसे हैं। बरोट वाली साइड से ही नहीं, लड-भड़ोल वाली तरफ से भी। यही नहीं, कई परिवारों की जड़ें सरकाघाट, धर्मपुर, भंगाल, संधोल, बैजनाथ वगैरह से हैं। इन इलाक़ों से आए लोग शैव, शाक्त या वैष्णव परंपराओं से प्रभावित रहे, इसलिए उनके मंदिर, आराध्य और अनुष्ठान आदि वैसे ही थे। मगर चौहार घाटी अपनी भौगोलिक परिस्थिति की वजह से बाहरी प्रभाव से बची रही और वहां सनातन उपासना पद्धतियां काफ़ी हद तक अपने मौलिक स्वरूप में बनी रहीं और अच्छी बात है कि आज भी बनी हुई हैं।

जैसा कि मैंने पहले लिखा था कि सुक्राह्ट्टी में चैत्र में होने वाला मेला चौहार घाटी के लिए बहुत अहम होता था। अब मेरा ये भी मानना है कि जोगिंदर नगर के देव मेले की शुरुआत भी चौहार घाटी के लोगों की वजह से हुई होगी। देव हुरंग नरैण और पशाकोट जब मंडी शिवरात्रि मेले के लिए रवाना होते हैं तो वो अपने मूल स्थान लौटने से पहले बड़े इलाक़े में बसे अपने श्रद्धालुओं के घरों में जाते हैं और उनकी बस्तियों के आसपास होने वाले मेलों में शामिल होते हैं। ये कितनी खूबसूरत बात है कि देवता अपने श्रद्धालुओं के हर काम में शामिल हों, अगर वे कहीं दूर बस जाएं तो मिलने के लिए उनके पास आएं।

बहरहाल, इसी क्रम में वो जिमजिमा, दुल, बनाड़, गलू, बनाई, हराबाग और दूसरी जगहों में बसे चौहार घाटी के लोगों से भी मिलने आते थे। फिर या तो उसी दौरान यहां होने वाले किसी मेले में वो भी शिरकत करते थे या फिर उनके आगमन के शुभावसर पर ही मेले जैसा माहौल बन जाता होगा। हो सकता है उस उत्सव ने आज के देव मेले का रूप ले लिया हो।

बहरहाल, फिर लौटते हैं मुख्य विषय पर, जिससे इस पोस्ट की शुरुआत हुई। तो जो टीनेजर्स दूरदराज़ के गांवों से जोगिंदर नगर या मंडी जैसे क़स्बों में पढ़ाई या नौकरी आदि की तैयारी के लिए आते हैं, तो वो नए माहौल में अक्सर सेल्फ़ कॉन्शस महसूस करते हैं। उनमें से कइयों को लगता होगा कि उनका लहजा, पहनावा या बैकग्राउंड उन्हें दूसरों से अलग कर देते हैं।

इन हालात में बहुत बार सोशल एंग्ज़ाइटी और इंपोस्टर सिंड्रोम जैसी भावनाएं पैदा हो सकती हैं। इससे वो खुद आउटसाइडर जैसा महसूस करने लगते हैं। वो भीड़ में होकर भी अकेले पड़ जाते हैं। भले कोई उन्हें ऐसा महसूस करवाए या न करवाए। ये एक तरह का परसीव्ड आइसोलेशन है और हममें से बहुत से लोगों ने नए माहौल में जाने पर इसे महसूस किया होगा।

लेकिन जैसे ही जोगिंदर नगर का मेला शुरू होता है, उनके अपने गांवों के आराध्य देवताओं के रथ क़स्बे में प्रवेश करते हैं और एक कमाल का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन होता है। वो मेला सिर्फ एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि यह उनके अंदर छिपी एक कलेक्टिव आइडेंटिटी को ऐक्टिव कर देता है। उनकी सेंस ऑफ़ बिलॉन्गिंग मज़बूत होती है। तब वो अकेले या आइसोलेटेड नहीं रह जाते। बल्कि वो एक बड़े ग्रुप, एक कॉमन हिस्ट्री और आइडेंडिटी का हिस्सा बन जाते हैं।

जिन सड़कों पर गुज़रते हुए उन्हें कभी झिझक महसूस हुई होगी, वहीं से नाटी डालते हुए गुज़रना एक तरह से साइकलॉजिकल रीक्लेमिंग ऑफ़ स्पेस है। उनका एक-दूसरे के साथ मिलकर जश्न मनाना उनमें आत्मविश्वास भरता है। ये मेला उन युवाओं को आइडेंटिटी वैलिडेशन देता है। बताता है कि आप जहां से आते हैं, वो आपकी ताकत है, कमज़ोरी नहीं।

और खुशी की बात है कि धीरे-धीरे यह मेला एक ऐसा साझा स्पेस बनता गया है, जहां पहाड़ और मैदान का फर्क पीछे छूटता गया है। ये ऐसा मेला है, जहां मैदानी इलाकों की प्रचलित हिंदू मान्यताएं, जिनमें शास्त्रों और स्थापित परंपराओं का प्रभाव है, वो स्थानीय आस्थाओं, प्रकृति और जीवंत देव परंपराओं पर चलने वाली पहाड़ों की देव संस्कृति से घुल-मिल जाती है।

झांझ और नगाड़ों की ताल के बीच शहनाइयों, तूरी और नरसिंगे की आवाज़ अद्भुत वातावरण के बीच, जब चौहार घाटी और विभिन्न स्थानों से आए देवताओं, उनके साथ चलने वाले देवलुओं और श्रद्धालुओं पर जोगिंदर नगर क़स्बे में रहने वाले लोग अपनी छतों और बालकनी से फूलों की बारिश करते हैं तो सारी लकीरें मिट जाती हैं।

यही कामना है कि सब लोग इसी उत्साह और आत्मविश्वास के साथ जश्न मनाते रहें- इस मेले का ही नहीं, जीवन का भी। और जब भी मौका मिले, इस मेले में आएं, झूमकर नाचें-गाएं और अपनी यादों को जिएं। सेलिब्रेट करें अपना इतिहास, अपनी संस्कृति।

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