Suraj Prakash Rao

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17/02/2026

गोचर–ओरण बचाओ, खेजड़ी बचाओ : राजस्थान की संस्कृति, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था की पुकार
राजस्थान की पावन धरती पर सदियों से ओरण, गोचर, नाड़ी, तालाब, पाइतान, खेजड़ी वृक्ष और पारंपरिक (ट्रेडिशनल) पेड़ केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था, पर्यावरण और पशुधन की जीवनरेखा रहे हैं।
बीकानेर में चले गोचर बचाओ आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि जब जनता संगठित होती है तो अपनी धरोहर को बचाया जा सकता है। वहीं आज भी जैसलमेर में ओरण–गोचर बचाओ आंदोलन जारी है, जो समाज की जागरूकता और संकल्प का प्रतीक है।
चिंता का विषय यह है कि पूरे राजस्थान की गोचर भूमियों के अधिग्रहण से जुड़े आदेश अब भी प्रभाव में हैं। प्रश्न यह उठता है—क्या राज्य सरकार बड़ा दिल दिखाते हुए इन भूमियों की सुरक्षा के लिए 1-9-2025 का आदेश वापस लेगी? क्या सरकार राजस्थान की संस्कृति, विरासत, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी—गोपालन व पशुपालन की ओर ठोस कदम उठाएगी?
आज समय की माँग है कि “खेजड़ी बचाओ राजस्थान” केवल नारा न रहकर एक सशक्त जनअभियान बने। साथ ही राजस्थान के पारंपरिक (ट्रेडिशनल) पेड़ों—जैसे खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, पीपल, बड़ आदि—को भी विशेष संरक्षण दिया जाए, क्योंकि यही पेड़ मरुस्थल की पहचान, छाया, औषधीय गुण और पशुओं के चारे का आधार हैं।
सरकार से जनअपेक्षा
गोचर–ओरण भूमियों को चारा युक्त कर विकसित करने की स्पष्ट नीति बने
हर जिले में गोचर भूमि का संरक्षण, सीमांकन और हरित विकास हो
राजस्थान के ट्रेडिशनल पेड़ों के संरक्षण व बड़े स्तर पर रोपण की विशेष योजना बने
खेजड़ी सहित स्थानीय प्रजातियों को काटने पर सख्त रोक व कड़ा कानून
नाड़ी, तालाब और पाइतान का पुनर्जीवन व वर्षाजल संचयन को बढ़ावा
पशुपालकों के हित में स्थायी चारागाह विकास योजनाएँ लागू हों
गोचर, ओरण और पारंपरिक पेड़ क्यों आवश्यक हैं?
पर्यावरण संरक्षण – जैव विविधता और हरित संतुलन
जल संरक्षण – वर्षाजल संचयन और भूजल संतुलन
ग्रामीण अर्थव्यवस्था – पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और रोजगार
धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व – आस्था और परंपरा के पवित्र स्थल
चारा व औषधीय महत्व – पशुधन और मानव जीवन दोनों के लिए उपयोगी
यदि गोचर, ओरण, खेजड़ी और राजस्थान के पारंपरिक पेड़ सुरक्षित रहेंगे, तो यह केवल जमीन या वृक्ष बचाना नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण, मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवंत संस्कृति को सुरक्षित रखना होगा।
आज आवश्यकता है समाज की एकजुटता, सरकार की संवेदनशील नीति और पर्यावरण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की।
जब गोचर हरे-भरे होंगे, ओरण सुरक्षित होंगे और पारंपरिक पेड़ संरक्षित रहेंगे—तभी राजस्थान सच मायनों में समृद्ध बनेगा, और “सोने की चिड़िया” बनने से कोई नहीं रोक सकेगा।
1. मरुस्थलीय पारिस्थितिकी (Desert Ecology) का आधार:
राजस्थान का पारिस्थितिकी तंत्र देश के अन्य हिस्सों से भिन्न और अत्यंत नाजुक है। यहाँ के ओरण और गोचर भूमि केवल खाली पड़े मैदान नहीं हैं; वे एक जटिल इकोसिस्टम हैं जो मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकते हैं। खेजड़ी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) जैसे वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बांध कर रखती हैं, और इनकी पत्तियां भूमि को उपजाऊ बनाती हैं। यदि इन पारंपरिक प्रणालियों को नष्ट किया गया, तो मरुस्थलीकरण (Desertification) की गति को रोकना असंभव हो जाएगा।
2. पशुपालन: राजस्थान की आर्थिक रीढ़:
यह समझना आवश्यक है कि राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि से अधिक पशुपालन पर निर्भर है। वर्षा की अनिश्चितता के कारण, किसान के लिए गाय, भैंस, भेड़ और ऊंट ही आय और सुरक्षा का स्थायी स्रोत हैं। गोचर भूमि इन मरुस्थलीय पशुपालकों के लिए 'जीवन रेखा' है। यदि गोचरों का अधिग्रहण जारी रहा, तो छोटे और सीमांत किसान पशु पालने में असमर्थ हो जाएंगे, जिससे ग्रामीण गरीबी और पलायन बढ़ेगा।
3. ओरण: आस्था और संरक्षण का अद्भुत संगम:
'ओरण' की अवधारणा दुनिया के लिए एक मिसाल है कि कैसे आस्था के माध्यम से पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है। देवताओं के नाम पर छोड़ी गई ये भूमियां सदियों से जैव विविधता (Biodiversity) का सुरक्षित भंडार रही हैं। आधुनिक विकास के नाम पर इन पवित्र वनों से छेड़छाड़ करना न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करना है, बल्कि एक सफल पारंपरिक संरक्षण मॉडल को नष्ट करना भी है।
4. जल प्रबंधन का पारंपरिक ज्ञान:
नाड़ी, तालाब और पाइतान (आगोर - जहाँ से पानी बहकर तालाब में आता है) राजस्थान के जल प्रबंधन के अद्भुत उदाहरण हैं। गोचर और ओरण अक्सर इन जल स्रोतों के जलग्रहण क्षेत्र (Catchment areas) होते हैं। यदि गोचरों पर अतिक्रमण होगा या वे कंक्रीट के जंगल में बदलेंगे, तो ये पारंपरिक जल स्रोत स्वतः ही सूख जाएंगे, जिससे जल संकट और गहराएगा।
सरकार के लिए स्पष्ट संदेश:
यह आंदोलन किसी विकास विरोधी मानसिकता का परिचायक नहीं है, बल्कि यह "टिकाऊ विकास" (Sustainable Development) की मांग है। सरकार को यह समझना होगा कि सौर ऊर्जा प्लांट या अन्य उद्योगों के लिए जमीन का अधिग्रहण करते समय, हजारों वर्षों से स्थापित उस संतुलन को नहीं तोड़ा जा सकता जो यहाँ के जीवन का आधार है।
* 1-9-2025 के आदेश पर पुनर्विचार: जैसा कि आपने उल्लेख किया है, सरकार को गोचर भूमि के अधिग्रहण से जुड़े आदेशों पर तत्काल रोक लगाकर एक संवेदनशील समीक्षा करनी चाहिए।
* कानूनी कवच: केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं है। गोचर और ओरण भूमि को 'संरक्षित श्रेणी' में डालकर उन्हें गैर-हस्तांतरणीय (Non-transferable) बनाने के लिए कड़े कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
आज राजस्थान एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता अदूरदर्शी औद्योगीकरण का है जो अपनी जड़ों को काट रहा है, और दूसरा रास्ता अपनी विरासत, पर्यावरण और पारंपरिक ज्ञान को साथ लेकर चलने का है।
बीकानेर और जैसलमेर की जनता ने रास्ता दिखा दिया है। अब समय है कि पूरा राजस्थान—किसान, पशुपालक, पर्यावरणविद्, और नीति-निर्माता—एक साथ आएं। क्योंकि यदि खेजड़ी नहीं बची, गोचर नहीं बचे, तो वह राजस्थान भी नहीं बचेगा जिसकी गौरवगाथा दुनिया गाती है। यह लड़ाई भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
#खेजड़ीबचाओ
PMO India CMO Rajasthan Bharatiya Janata Party (BJP) Bhupender Yadav BJP BJP Rajasthan Bhajanlal Sharma

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