The common man

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01/11/2025

जो #पुरुष अपनी यौ*न इच्छाओं पर #नियंत्रण रख सकता है, वही लंबे समय तक इस धरती पर सुख-शांति से जी सकता है।

पुरुषों को ये समझना चाहिए कि उनकी कई परेशानियों और पतनों की जड़ कई बार कई गर्लफ्रेंड्स होती हैं।

हर लड़की की आत्मा अच्छी नहीं होती।

कुछ राक्षसी स्वभाव की होती हैं, कुछ में ज़हर छिपा होता है, और कुछ औरतें किसी की किस्मत को बर्बाद करने वाली होती हैं। जैसा की अभी हाल में आप सब देख चुके हैं...!!

इसलिए सावधान रहें।

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1. हर बार अपने इरेक्शन (लिंगोत्थान) की बात मत मानो।

अधिकतर बार यह तुम्हें गलत दिशा में ले जाता है।

अगर आप अपने इरेक्शन पर नियंत्रण नहीं रख पाए, तो ज़िंदगी छोटी और गरीबी से भरी हो सकती है।

2. किसी लड़की के कर्व्स, बॉडी और फिगर को देखकर रिलेशनशिप मत बनाओ।

ये सब धोखा है, खासकर सोशल मीडिया पर। असली सुंदरता और मूल्य इससे कहीं ज्यादा होता है।

3. हर स्कर्ट के नीचे जो है, उसे हासिल करने की कोशिश मत करो।

कुछ स्कर्ट के नीचे सांप होते हैं, जो काटकर चैन छीन लेते हैं। संयम और अब्स्टिनेंस (संयमित जीवन) अक्सर सबसे अच्छा फल देता है।

4. कई गर्लफ्रेंड्स रखना मर्दानगी नहीं है।

ये सिर्फ आपको औरतबाज़, धोखेबाज़, और बच्चा बनाता है — असली मर्द नहीं।

5. सिर्फ बेड में अच्छे होने से मर्द नहीं बनते।

असली मर्द वह है जो अपनी जिम्मेदारियों से भागता नहीं, उन्हें पूरा करता है।

6. उस लड़की का सम्मान करो जो तुमसे सच्चा प्यार करती है।

किसी लड़की का प्यार और सपोर्ट मिलना आसान नहीं होता। यह उसकी भावनात्मक ताकत और ईमानदारी का सबूत है।

7. दुनिया उन्हीं पुरुषों को सम्मान देती है जो कामयाब होते हैं।

तुम्हारे पास अगर बहुत सारी गर्लफ्रेंड्स हैं, तो कोई तुम्हारी तारीफ नहीं करेगा।

ये सिर्फ समय, ऊर्जा, पैसा और वीर्य की बर्बादी है।

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याद रखो:

ईमानदार, वफादार और ज़िम्मेदार पुरुष ही असली मर्द कहलाते हैं।

संयम ही सफलता की कुंजी है

15/06/2025

केदारनाथ हैलीकॉप्टर दुर्घटना में 23 महीने के बच्चे समेत 7 लोगों को मौत 🥲

01/06/2025

भारत में प्रचलित सती प्रथा का वर्णन ग्रीक की तीन हज़ार साल पुरानी पांडुलिपियों में वर्णित है.. इतनी पुरानी प्रथा को पहले मुग़लों ने प्रतिबंधित किया फिर उनके बाद अंग्रेज़ों ने इस पर प्रतिबंध लगाया, कई कानून बनाए और उसे सारे भारत में लागू किया.. अंग्रेज़ों द्वारा तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी भारत की बहुसंख्यक भीड़ इसे मान नहीं रही थी और वो सती प्रथा को चोरी छिपे जारी रखे थी.. सबसे ताज़ा रिकॉर्ड जो सती प्रथा का मिलता है वो है 1987 में रूप कंवर का.. हज़ारों और सैकड़ों सालों बाद भी लोगों की सती प्रथा में अभी भी आस्था है और सती के बहुत सारे मंदिर हैं भारत में

सती प्रथा को बहुसंख्यक भीड़ द्वारा किसी क्रांति के तहत नहीं बंद किया गया.. इसे कानून द्वारा जबरदस्ती बंद करवाया गया.. जो ये दावे करते हैं कि "हमने अपने धर्म में स्वयं सुधार किया और हम बड़ी जागृत भीड़ हैं", वो अभी भी सती की पूजा करते हैं और उसे महिमामंडित करते हैं.. विश्व की किसी भी धार्मिक भीड़ ने स्वयं से अपने धर्म में कभी कोई सुधार नहीं किए.. इसे हमेशा दूसरों ने किया या दूसरी सभ्यताओं से प्रभावित बुद्धिजीवियों ने किया.. और भीड़ हमेशा इन "सुधारों" के विरोध में ही रही है

क्या आपको लगता है जो भीड़ अभी भी सती पूज रही है वो अपने समाज की तमाम कुप्रथाओं को देख या समझ रही है? नहीं.. इस भीड़ को सिर्फ़ लगता है कि वो सुधार की ओर अग्रसर है मगर ये सुधार सिर्फ़ कानून और बल से ही लागू करवाए जा रहे हैं इस भीड़ पर.. चाहे वो दलित उत्पीड़न हो या छुआ छूत, सब कुछ कानून द्वारा बलपूर्वक ही सुधारा जा रहा है.. भीड़ इसे स्वयं न कभी सुधारेगी, और न ही उसकी अपने समाज में सुधार की कोई मंशा होती है

इस भीड़ से आप कहें कि शादी एक कुप्रथा है जो पूरे के पूरे समाज को सती प्रथा से अधिक प्रताड़ना में जीने पर मजबूर कर रही है, तो भीड़ इसे न समझेगी.. भीड़ इन सब बातों को ऐसे ही समझती है.. एक प्रथा जो बन जाती है, भीड़ के लिए वो आकाश ने बैठे किसी भगवान द्वारा बनाई गई प्रथा होती है और भीड़ के हिसाब से समाज अगर इस प्रथा को बंद कर देगा तो सारा समाज बिखर जाएगा, इंसानों के घर उजड़ जाएंगे, आबादी ख़त्म हो जाएगी, परिवार तबाह हो जाएंगे, इंसान जानवर बन जाएगा, हर तरफ़ त्राहिमाम मच जाएगा.. जबकि ये भीड़ देख भी रही है कि सैकड़ों लोग बिना शादी के रहते हैं साथ में, सैकड़ों देशों में सैकड़ों समाज बिना शादी के परिवार भी बनते हैं और चलाते हैं और उनका कुछ नहीं बर्बाद हुआ जा रहा है, मगर भारतीय भीड़ के लिए वो सब व्यभिचारी हैं, अनैतिक हैं, और इस पृथ्वी से ख़त्म करने योग्य हैं

ये भीड़ वही है जो सती पूज रही है, अपने बच्चों का खतना करवा रही है, एक दिन में करोड़ों जानवर काट रही है अपने ईष्ट को प्रसन्न करने के लिए और इस भीड़ को लगता है कि वो शादी की बजाय अगर प्रेम करने लगेगी तो उसका समाज बिखर जाएगा और शादी की जगह प्रेम करना, व्यभिचार, अनैतिक और राक्षसी प्रवृति का काम है

भीड़ की मानसिकता अगर आप देखेंगे थोड़ा साक्षी भाव के साथ तो आपको हंसी आएगी.. भीड़ का मनोविज्ञान ग़ज़ब भेड़ों वाला मनोविज्ञान होता है.. बस ये "में में में" नहीं करती है, भाषा बोलती है क्योंकि इसके पास वोकल कार्ड है.. और भीड़ को लगता है कि ये प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ लोगों की भीड़ है.. इसके अलावा सब जानवर हैं

~सिद्धार्थ ताबिश

15/05/2025

जब मेरे पति और मैं लगभग अलग हो गए थे, तब हमारे बीच कोई ज़ोरदार झगड़े नहीं हुए।
न कोई धोखा, न कोई चीख-पुकार।

बस एक धीमी, शांत सी दूरी थी, जो अनजाने में हमारे बीच पनप गई।

ये सब रोज़मर्रा की बातों में था,
जहां हमने एक-दूसरे की ओर बढ़ना बंद कर दिया था।

ये चुपचाप हुआ —
डिशवॉशर और सोने के समय के बीच के खालीपन में।

“कल दूध ले आना?” और “लॉन्ड्री बदली क्या?” जैसी बातों के बीच की खामोशी में।

कभी हम हॉलवे में एक-दूसरे के साथ फ्लर्ट करते थे,
और फिर एक दिन, बस एक-दूसरे के पास से यूं ही गुज़रने लगे।

अब भी प्यार था, अब भी साथ थे —
लेकिन एक-दूसरे की ओर बढ़ना बंद कर चुके थे।

यही वो बात है, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता।
ना कोई ड्रामा, ना कोई बड़ा झगड़ा — बस एक खामोश दूरी।

एक ऐसा मौसम, जब प्यार आदत बन जाता है।
जब हम एक-दूसरे को थामना छोड़ देते हैं,
और धीरे-धीरे हम रूममेट्स जैसे महसूस करने लगते हैं — न कि आत्मा के साथी।

कुछ साल पहले, हम वहीं थे।

एक रात, कई हफ्तों के यूं ही साथ रहने के बाद,
जब मेरे पति ने पूछा, “कुछ गलत है क्या?”
तो मैंने सच्चाई बताई।

"मुझे हमारी याद आ रही है," मैंने कहा।
मैं उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी।
ना मुझे फूल चाहिए थे, ना कोई खास डेट।

मुझे छोटी-छोटी चीजें याद आ रही थीं।
वो पल जब हम एक-दूसरे को महसूस करते थे।
जब वो खाना बनाते समय मेरी पीठ पर हाथ रखते थे,
बिना वजह के दी गई वो कोमल सी किस।
वो छोटे, खामोश पल जो कहते थे, "मैं अब भी तुम्हें देख रहा हूं।"

उस रात हम चुपचाप बिस्तर में लेट गए।
बिना और कुछ कहे, बस उनका हाथ मेरे हाथ की ओर बढ़ा।

अगली सुबह, जब मैं बच्चों का नाश्ता बना रही थी,
वो मेरे पीछे आए,
मुझे गले लगाया, गाल पर एक प्यारी सी किस दी और कहा,
“मुझे भी हमारी याद आ रही थी। हम अब भी यहीं हैं।”

उसी पल कुछ बदल गया।

वो चिंगारी किसी बड़े इशारे से वापस नहीं आई।
ना ही किसी स्पेशल डेट से।

वो लौटी हमारी रसोई में,
जहां मैं एक थका हुआ डिश टॉवल पकड़े खड़ी थी —
उस आदमी के साथ जिसे मैं सालों से प्यार करती हूं —
जिसने याद दिलाया कि "हम अब भी साथ हैं।"

हम टूटे नहीं थे,
बस थोड़ा थके हुए थे, व्यस्त थे, और... सामान्य।

उस पल ने मुझे एक बात सिखाई, जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगी...

प्यार एक झटके में खत्म नहीं होता।
वो धीरे-धीरे फीका पड़ता है, सैकड़ों छोटे-छोटे लम्हों में।
और अगर ध्यान न दिया जाए, तो लगने लगता है कि वो दूरी, प्यार के खत्म होने का संकेत है।
लेकिन ऐसा नहीं होता।

मैंने सीखा है कि प्यार कहीं चला नहीं जाता,
वो बस इंतज़ार करता है।

इंतज़ार करता है — महसूस किए जाने का,
फिर से चुने जाने का,
उस शांत, साधारण से पल में,
जब कोई फिर से कहे — “मैं अब भी तुम्हारे साथ हूं।”

कभी-कभी, बस एक नरम-सा चुम्बन,
एक हल्का स्पर्श,
और दो थके हुए लोग,
जो अब भी एक-दूसरे को पाने की चाह रखते हैं —
इतना ही काफी होता है प्यार को फिर से लौटा लाने के लिए।
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