Vijay Kumar
एक नगर में एक राजा रहता था। राजा जब भी महल से बाहर जाता, हमेशा अपने घोड़े पर ही जाता था। एक बार वह अपने नगर को देखने एंव जनता की समस्याओं को सुनने के लिए पैदल ही भ्रमण पर निकला। उस समय जूते नहीं होते थे इसलिए जमींन पर कंकड़ और पत्थरों के कारण राजा के पैर दुखने लगे। राजा ने इस समस्या के हल के लिए अपने मंत्रियों की एक बैठक बुलाई।
ज्यादातर मंत्रियों का यही सुझाव था कि क्यों न पूरे नगर के रास्ते को चमड़े की मोटी परत से ढक दिया जाए। लेकिन इसके लिए बहुत सारे धन एंव अन्य संसाधनों की जरूरत थी।
तभी राजा के पास खड़े एक सिपाही ने सुझाव दिया कि पूरे नगर को चमड़े की परत से ढकने से अच्छा यह है कि क्यों न हम अपने पैरों को ही चमड़े की परत से ढक दें। इससे न केवल हमारे पैर सुरक्षित रहेंगे बल्कि ज्यादा धन भी खर्च नहीं होगा। सिपाही का सुझाव सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और उसने सभी के लिए “जूते” बनवाने का आदेश दिया।
एक बार शहंशाह अकबर (Akbar) एंव बीरबल (Birbal) शिकार पर गए और वहां पर शिकार करते समय अकबर की अंगुली कट गयी। अकबर को बहुत दर्द हो रहा था। पास में खड़े बीरबल( Birbal ) ने कहा – “कोई बात नहीं शहंशाह, जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।” अकबर( Akbar ) को बीरबल की इस बात पर क्रोध आ गया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि बीरबल को महल ले जा कर कारागाह में डाल दिया जाये। सैनिकों ने बीरबल को बंधी बना कर कारागाह में डाल दिया एंव अकबर अकेले ही शिकार पर आगे निकल गए।
रास्ते में आदिवासियों ने जाल बिछा कर शहंशाह अकबर को बंधी बना लिया और अकबर की बली देने के लिए अपने मुखिया के पास ले गए।
जैसे ही मुखिया अकबर की बली चढाने के लिए आगे बढे तो किसी ने देखा कि अकबर की तो अंगुली कटी हुई है अर्थात् वह खंडित है इसलिए उसकी बली नहीं दी जा सकती और उन्होंने अकबर को मुक्त कर दिया। अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ एंव वह तुरंत बीरबल के पास पहुँचा। अकबर (Akbar) ने बीरबल को कारागाह से मुक्त किया एंव उसने बीरबल से माफ़ी मांगी कि उससे बहुत बड़ी भूल हो गयी जो उसने बीरबल (Birbal) जैसे ज्ञानी एंव दूरदृष्टि मित्र को बंधी बनाया। बीरबल ने फिर कहा – जो भी होता है अच्छे के लिए होता है। तो अकबर ने पूछा कि मेरे द्वारा तुमको बंधी बनाने में क्या अच्छा हुआ है?
बीरबल ने कहा, शहंशाह अगर आप मुझे बंधी न बनाते तो में आपके साथ शिकार पर चलता और आदिवासी मेरी बली दे देते। इस तरह बीरबल की यह बात सच हुई की जो भी होता है उसका अंतिम परिणाम अच्छा ही होता है।
दोस्त्तों यह कहानी (Moral Story) साबित करती है कि जो होता है, वह अच्छे के लिए ही होता है (Whatever happens, happens for good)। अच्छे का अर्थ उचित एंव न्यायपूर्ण परिणाम से है। दोस्तों अगर आपको ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में न्याय करने के लिए बुलाया जाये जिसने कोई बुरा कार्य किया है तो आप क्या करेंगे? आप जरूर उसे ऐसी सजा देंगे या ऐसा कार्य करने को बोलेंगे जिससे कि उसको अपनी गलती का अहसास हो जाये और ऐसा करना ही सबसे न्यायपूर्ण एंव उचित होगा| दोस्तों अब प्रश्न उठता है कि सजा देने में उस व्यक्ति का क्या अच्छा हुआ जिसने कोई बुरा कार्य किया था? सजा देने में उस व्यक्ति का अच्छा ही हुआ है क्योंकि अगर उस व्यक्ति को इस बात का अहसास न हो कि उसने कुछ गलत किया है तो शायद वह व्यक्ति अपना सारा जीवन ऐसे ही बुरे कार्यो में व्यर्थ गँवा दे और जब उसके बाल सफ़ेद हो एंव दांत गिरने लगे तो इस बात पर पछताए की काश किसी ने उस वक्त सही रास्ता दिखा दिया होता तो यह जीवन (Life) व्यर्थ न जाता|
“शायद ही इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो मुसीबतों, कठिनाइयों, पराजय, मेहनत एंव गलतियों के बिना सफल हुआ हो। इसलिए हो सकता है कि आपकी मुसीबतें, कठिनाईयां, पराजय एंव गलतियाँ इस बात का सूचक है की आप जल्द ही सफल (Successful) होने वाले है।”
दोस्तों हमारे साथ भी हमेशा अच्छा ही होता है फर्क सिर्फ इस बात का है कि कुछ लोग इस बात पर विश्वास (Believe) करते है एंव हिम्मत नहीं हारते और यहीं दृढ़ निश्चय एंव विश्वास उनको सफलता (success) तक ले जाता है। वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग ऐसी बातों पर विश्वास (Believe) नहीं करते एंव जल्द ही निराश (Disappointed) हो जाते है और यही निराशा उनको सफल (successful) होने से रोकती है।
उस बालक का मन विद्यालय में नहीं लगता था। विद्यालय में वह और छात्रों के द्वारा मंदबुद्धि कहलाता था। कक्षा में भी वह बालक सबसे पीछे रहता था , उसके अध्यापक भी उससे नाराज़ रहते थे। क्योकि उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी नीचे था। कक्षा में भी उसका प्रदर्शन हमेशा निराशाजनक ही होता था। अपने दोस्तों एवं सहपाठियो के बीच वह उपहास का विषय था। विद्यालय में वह जब की प्रवेश करता उस बालक पर चारों ओर से व्यंग और बाणो की बौछार सी होने लगती। इन सब बातों से परेशान हो कर , तंग आकर विद्यालय जाना ही छोड़ दिया।
एक दिन वह बालक मार्ग पर यूँ ही चलता हुआ जा रहा था। चलते हुए उसे ज़ोरो की प्यास लगी, वह इधर – उधर अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी तलाशने लगा। अंत में उसे एक कुआँ दिखाई दिया , वे वहाँ गया और अपनी प्यास बुझाई। वह चलता – चलता काफी थक गया था , इसीलिए पानी पीने के बाद वही बैठ गया , तभी उसकी नज़र पत्थर पर पड़े , उस निशान पर गयी. जिस पर बार – बार कुँए से पानी खींचने के कारण रस्सी के निशान पड़ गए थे। वह मन ही मन सोचने लगा की जब बार – बार कुँए से पानी खींचने से पत्थर पर निशान पड़ सकते है तो निरंतर अभ्यास से मुझे भी विद्या आ सकती सकती है।
उसने अपने इस विचार को गांठ बांध लिया और पुनः विद्यालय जाना शुरू कर दिया। उसकी लगन देख कर अध्यापको ने भी उसका भरपूर सहयोग किया। उसने मन लगा कर कठिन परिश्रम किया। कुछ सालो बाद यही बालक महान विद्वान वरदराज के रूप में विख्यात हुए , जिन्होंने संस्कृत में मुग्धबोध और लघुसिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथो की रचना की।
इस कहानी का अर्थ – अगर धैर्य , लगन और परिश्रम से कार्य किया जाये तो उन पर विजय प्राप्त कर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। सामान्यता यह होता है की लोग बड़ी उत्सुकता से काम तो शुरू कर देते है परन्तु धैर्य खो देते है। लेकिन जो लोग लगन से काम करते रहते है। उन्हें सफलता अवश्य मिलती है।
एक बार एक राजा ने अपने राज्य के सबसे कुशल कारीगर को महल में बुलाया। राजा कारीगर की कला से बहुत प्रभावित था। उसने कारीगर को दरबार में बुलाया और कहा, “तुम हमारे लिए राज्य का सबसे सुदर महल बनाओ। हमारे पास धन को कोई कमी नहीं है तुम जितना धन मांगोगे उतना तुम्हे मिलेगा।
कारीगर कुशल तो था लेकिन उसे अपनी कला का घमंड आ चूका था। सब जगह से अपने काम की तारीफ सुनकर अब उसके मन में कामचोरी और आलस्य की प्रवति आ चुकी थी।
खैर, कारीगर महाराज की आज्ञा पा कर अपने काम में जुट गया। लेकिन थोड़े ही दिन बाद उसके मन में विचार उठा की क्यों न रद्दी, घटिया किस्म का माल लगाकर क्जल्दी से जल्दी महल का क्काम समाप्त कर के मोटा मुनाफा कमा लिया जाए। और उसने यही किया।
कारीगर ने घटिया किस्म का माल लगाकर महल की भुरभुरी दीवारें कड़ी कर दी।कारीगर ने बाहर से महल को सुन्दर साज सज्जा से चमका दिया लेकिन अन्दर से महल में क्जच्चा माल लगा था। थोड़े ही दिन में आकर्षक सुन्दरता वाला, सोने सी चमक-दमक वाला सुन्दर सा महल तैयार हो गया।
महल खड़ा करने के बाद अक्रिगर राजा की सेवा में पहुंचा और राजा को महल के बन्नने की सुचना दी। राजा अगले ही दिन महल का निरिक्षण करने के लिए पहुंचे। महल को देख राजा बहुत ही प्रभावित हुए।महल बहुत ही आकर्षक और सुन्दर लग रहा था।
राजा ने कारीगर की बहुत प्रशंशा की और कहा, “में तुम्हारी कुशलता से बहुत प्रभावित हूँ। इतने सुन्दर महल निर्माण के लिए तुम्हे जो भी इनाम दिया जाए वो कम है। में सोच रहा हूँ इस अद्भुत कार्य के लिए तुम्हें क्या इनाम दिया जाए। फिर थोडा सोच विचार कर महाराज मुस्कुराए और बोले, “लो तुम्हें यही यही महल पुरूस्कार में देता हूँ।”
महाराज की बात सुनकर कारीगर हतप्रभ रह गया। उसे क्या मालूम था की जिस महल को वह घटिया माल से बना रहा है वही महल एक दिन उसे इनाम में मिल जाएगा।
राजा महल का निरिक्षण कर और महल को कारीगर को इनाम में दे ककर चले गए। कारीगर अपने किए पर मुह छिपा कर रोने लगा।
इनाम के लालच में कारीगर का बनाया गया खोखला महल उसी के हत्थे चढ़ गया।
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