Waterman Rajendra Singh

Waterman Rajendra Singh

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Rajendra Singh is a highly respected social activist working with water and river issues in India. In 2015, Rajendra Singh has won the Stockholm Water Prize, also known as "the Nobel Prize for Water". In its citation, the judges say: "Today's water problems cannot be solved by science or technology alone. They are human problems of governance, policy, leadership, and social resilience.” … "Rajendr

Photos from Waterman Rajendra Singh's post 09/06/2026

**तरुण वैश्विक चित्र दीर्घा, भीकमपुरा**

तरुण भारत संघ ने अपने तरुण आश्रम में विश्व उत्पत्ति, ब्रह्मांड सृष्टि के सृजन, दशावतार तथा भारत की समस्त सांस्कृतिक विरासत को पत्थरों पर चित्रों के माध्यम से उकेरने का कार्य किया है। साथ ही, विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों, भारत के सभी राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों तथा सांस्कृतिक और सामाजिक नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्तियों के चित्र भी तरुण आश्रम की वैश्विक चित्र दीर्घा में स्थापित हैं।

इस चित्र दीर्घा में विशेष रूप से उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के चित्र भी मौजूद हैं जिन्होंने समाज में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से कार्य किया है। देशभर के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रकृति एवं संस्कृति के संरक्षण हेतु कार्य करने वाले पर्यावरण प्रेमियों तथा विश्व के विभिन्न तीर्थों को बचाने और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान देने वाले व्यक्तियों के चित्र भी पत्थरों पर उकेरे गए हैं।

यह वैश्विक चित्र दीर्घा तरुण भारत संघ ने अपने खेतों से निकले बड़े-बड़े पत्थरों पर बनाई है। यदि इन पत्थरों को निकालकर कहीं एक स्थान पर एकत्रित किया जाता, तो काफी भूमि अनुपयोगी हो जाती। इसलिए उपयुक्त समय पर इन पत्थरों को तरुण ताल के चारों ओर सात पंक्तियों में व्यवस्थित रूप से स्थापित किया गया। सबसे ऊपरी पंक्ति से लेकर नीचे की क्रमिक पंक्तियों तक इन चित्रों को उकेरा गया है। ये चित्र सामाजिक कार्यकर्ताओं को समाज सेवा की प्रेरणा देते हैं तथा पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं को प्रकृति संरक्षण के लिए कार्य करने हेतु उत्साहित करते हैं।

तरुण भारत संघ के परिसर में इन चित्रों को उकेरने का उद्देश्य यह भी है कि संस्था ने अपने पिछले 51 वर्षों के कार्यकाल में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से प्राकृतिक पुनर्जन्म का कार्य किया है। तरुण भारत संघ के प्रयासों ने विशेष रूप से अरावली पर्वतमाला के पुनर्जीवन का एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत किया है। एक ओर संस्था ने भारत के उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर अरावली के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके परिणामस्वरूप 7 मई 1992 को महत्वपूर्ण संरक्षणात्मक निर्णय सामने आया। दूसरी ओर, अवैध खनन को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर चेतना यात्राओं और जनजागरण अभियानों के माध्यम से संरक्षण का कार्य किया गया।

चित्र दीर्घा की पृष्ठभूमि में प्रकृति की ध्वनियाँ, विशेषकर हवा की आवाज़, प्रकृति और संस्कृति के योग एवं संयोग का संदेश देती हैं। जल से मिट्टी बनी, मिट्टी से जीव-जंतु उत्पन्न हुए, फिर पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ विकसित हुईं। इनके जीवन संचालन के लिए वायु, सूर्य की ऊर्जा और आकाश जैसे पंचमहाभूत आवश्यक बने। भारतीय परंपरा में इन पंचमहाभूतों के समन्वय को ही ईश्वर का स्वरूप माना गया है। इसी शक्ति ने मानव को जीवन जीने की कला प्रदान की, जिसे इन चित्रों में विविध रूपों में देखा और समझा जा सकता है। पंचमहाभूतों से निर्मित समस्त प्रकृति, मानव जीवन, भारतीय ज्ञान परंपरा, कालचक्र और देशकाल की अवधारणाओं को भी इस चित्र दीर्घा में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

चित्र दीर्घा को देखने के लिए प्रतिदिन स्कूली बच्चे, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग आते हैं। यहाँ आकर वे समझते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करने वाले लोगों और उसका शोषण करने वाले लोगों में कितना अंतर है। प्रकृति का पोषण करने वाले व्यक्तियों के चित्र इस दीर्घा में बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, जबकि प्रकृति का शोषण करने वाले लोगों के चित्र इसमें नहीं बनाए गए हैं। यद्यपि ऐसे लोगों के चित्र बनाने पर विचार किया गया है, परंतु अभी तक उन्हें शामिल नहीं किया गया है।

प्रकृति सबका सृजन करती है, जबकि उसका विनाश करने वाला व्यक्ति अपनी स्वार्थपूर्ण गतिविधियों से प्रकृति को क्षति पहुँचाकर अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास करता है। इसलिए इस चित्र दीर्घा में लाभ कमाने वालों के नहीं, बल्कि लोककल्याण और शुभ कार्यों में योगदान देने वाले लोगों के चित्र स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, धरती पर विद्यमान विभिन्न धर्मों में जल के महत्व को दर्शाने वाले विचार भी भूमि से निकले पत्थरों पर अंकित किए गए हैं।

इस दीर्घा के सभी चित्र तरुण भारत संघ की भूमि से प्राप्त बड़े और छोटे पत्थरों पर ही उकेरे गए हैं। पिछले 51 वर्षों में जिन ग्रामीण महिलाओं, पुरुषों और कार्यकर्ताओं ने तरुण भारत संघ के साथ मिलकर जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए, उनके चित्र भी यहाँ स्थापित हैं। संस्था के प्रारंभिक दौर के कार्यकर्ताओं को भी इस दीर्घा में सम्मानपूर्वक स्थान दिया गया है।

इस प्रकार यह चित्र दीर्घा वास्तव में वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर चुकी है, क्योंकि इसमें उन्हीं व्यक्तियों के चित्र हैं जिन्होंने प्रकृति के पोषण, संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया है। इसलिए यह प्रकृति और संस्कृति की पोषक एक वैश्विक चित्र दीर्घा है। इस चित्र दीर्घा में सभी धर्मों में जल के बारे जो व्याख्या की गई,उसे भी दर्शाया गया है। जो इस प्रकार है - हिन्दू धर्म- ‘‘आपोः देवताः। जल जीवन है। यही जीविका और अध्यात्म है। सभी को सब कुछ देने वाला यही नारायण है। यही सृष्टि का सर्जन और संहार करने वाली षक्ति है।‘‘
इस्लाम धर्म-‘‘जल खुदा का रहमोकरम है। यह पाक-पवित्र है। यही मानवीय षरीर को पाक रखता है।’’
सिक्ख धर्म-‘‘पाणी पिता, धरती माता, वायु गुरु है।‘‘
ईसाई धर्म-‘‘जल सभी को भरता है। जैसे कि भक्ति में लीन भक्तों को परमात्मा भरता है।’’ जल हमारी षारीरिक जरूरतों के लिए महत्त्वपूर्ण है, उसी प्रकार परमात्मा हमारी आध्यात्मिक आवष्यकता है।’’
बहाई धर्म-‘‘जल का इस्तेमाल भगवान की मर्जी के खिलाफ होगा तो मनुष्य ऐसी प्यास का षिकार हो जाएगा,...जिसे समुद्र भी नहीं बुझा सकता।‘‘
बौद्ध धर्म-‘‘परलोक में जाने वाले प्राणी को जल से पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है।‘‘
यहूदी धर्म-‘‘पानी खुदा का ऐसा षस्त्र है, जो किसी के लिए वरदान और किसी के लिए श्राप बन सकता है।’’
षिन्टो धर्म-‘‘ प्राकृतिक, प्रत्येक अंग पूजनीय है। जल प्रकृति के निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।’’
पारसी धर्म-‘‘जल, अग्नि और धरती पवित्र हैं। इनकी पवित्रता बचाना ही धर्म है।’’

इस लेख को पढ़ने वाले सभी मित्रों और साथियों से आग्रह है कि वे इस वैश्विक चित्र दीर्घा को देखने अवश्य आएँ। यह चित्र दीर्घा तरुण आश्रम, भीकमपुरा,थानागाजी अलवर राजस्थान में है। इन दिनों गर्मी थोड़ी अधिक है, ऐसे में 15 अगस्त से लेकर 15मार्च तक का समय सबसे उत्तम है। आपको जब अनुकूल लगे; जरूर आएं।

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