Vicky Rastogi Advocate

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29/04/2026

जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में खरीदार स्वयं पीड़ित होता है, क्योंकि उसकी संपत्ति का स्वामित्व ही विवादित हो जाता है, यदि विक्रेता ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर बिक्री की हो।

यह मामला तमिलनाडु में पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके पिता की 1988 की कथित वसीयत जाली थी। इसी वसीयत के आधार पर 1998 में संपत्ति को कई खरीदारों को बेच दिया गया, जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल था।

बाद में जालसाजी, धोखाधड़ी और साजिश के आरोपों में मामला दर्ज किया गया। अपीलकर्ता ने यह कहते हुए कार्यवाही रद्द करने की मांग की कि वह एक bona fide खरीदार है और वसीयत की जालसाजी में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संपत्ति का सौदा बाद में जाली दस्तावेज पर आधारित पाया गया, खरीदार को स्वतः आपराधिक आरोपी नहीं बनाया जा सकता। जब तक यह साबित न हो कि खरीदार को जालसाजी की जानकारी थी या वह साजिश में शामिल था, उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती।

अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता और खरीदार के बीच कोई प्रत्यक्ष अनुबंध (privity of contract) नहीं था, इसलिए तीसरा पक्ष खरीदार पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकता।

इसी के साथ, कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए खरीदार के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

25/04/2026

मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,

"यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रोक लग जाती है।"

कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें हाईकोर्ट ने वक्फ़ ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल ने प्रतिवादी (Respondent) के पक्ष में 'सर्विस इनाम' ज़मीन को बेचने का सौदा रद्द कर दिया था।

यह मामला कुरनूल ज़िले में 3 एकड़ ज़मीन के एक टुकड़े से जुड़ा था। इसमें मुख्य सवाल यह था कि क्या यह ज़मीन वक्फ़ संपत्ति (सर्विस इनाम) थी, जो मस्जिद में धार्मिक सेवाओं के लिए दी गई थी। इसलिए इसे बेचा नहीं जा सकता था; या यह एक निजी संपत्ति (निजी इनाम) थी, जिसे बिक्री के कागज़ों (Sale Deeds) के ज़रिए कानूनी तौर पर बेचा जा सकता है।

वादी (Plaintiffs) ने 1985 और 1996 में हुए बिक्री के कागज़ों के आधार पर ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ जताया और बोर्ड के ख़िलाफ़ यह आदेश मांगा कि उन्हें ज़मीन का शांतिपूर्ण इस्तेमाल करने दिया जाए। हालांकि, वक्फ़ बोर्ड ने यह दलील दी कि यह ज़मीन ऐतिहासिक रूप से धार्मिक कामों के लिए दी गई थी और इसे वक्फ़ संपत्ति के तौर पर ही दर्ज किया गया था।

इस मामले में एक अहम मोड़ 1945 के बँटवारे के एक कागज़ (Partition Deed) से आया, जिसका सहारा खुद वादी ने ही ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित करने के लिए लिया था। हालांकि, उस बँटवारे के कागज़ में विवादित ज़मीन को 'सर्विस इनाम' के तौर पर ही बताया गया।

वक्फ़ ट्रिब्यूनल ने वादी-प्रतिवादी (Plaintiff-Respondent) का वह मुक़दमा ख़ारिज किया, जिसमें उसने अपील करने वाले-प्रतिवादी (Appellant-Defendant) के ख़िलाफ़ ज़मीन पर हमेशा के लिए रोक लगाने और अपना मालिकाना हक़ घोषित करने की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने यह फ़ैसला इसलिए दिया, क्योंकि प्रतिवादी बिक्री के कागज़ों के ज़रिए खरीदी गई बताई जा रही ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित नहीं कर पाया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलट दिया और वादी-प्रतिवादी के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि वक्फ़ बोर्ड ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित करने में नाकाम रहा, जिसके बाद राज्य वक्फ़ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस मसीह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में सैयद अली बनाम ए.पी. वक्फ़ बोर्ड, (1998) 2 SCC 642 पर भरोसा करते हुए यह कहा गया,

“धार्मिक या धर्मार्थ सेवाएं देने के लिए दी गई ज़मीन का पूरा मालिकाना हक़ किसी व्यक्ति को नहीं मिल जाता। ऐसी ज़मीनें, जो मुस्लिम क़ानून के तहत पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ माने जाने वाले कामों के लिए दी जाती हैं, उन पर वक्फ़ संपत्ति का दर्जा लागू हो जाता है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि जब प्रतिवादी-वादी संपत्ति पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने का अपना दायित्व पूरा नहीं कर पाया तो अपीलकर्ता-प्रतिवादी का संपत्ति पर मालिकाना हक़ जताने में कमज़ोर पड़ना भी प्रतिवादी को निषेधाज्ञा (Injunction) और मालिकाना हक़ की घोषणा पाने में कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाएगा।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“यह भी ध्यान देना ज़रूरी है कि एक स्थापित सिद्धांत यह है कि जो वादी मालिकाना हक़ की घोषणा चाहता है, उसे अपने मामले की मज़बूती के आधार पर जीतना चाहिए, न कि प्रतिवादी पक्ष की कमज़ोरी के आधार पर। इस मामले में प्रतिवादी पक्ष ने घोषणा और निषेधाज्ञा पाने के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया, इसलिए उन्हें विवादित संपत्ति पर अपना साफ़ और वैध मालिकाना हक़ साबित करना ज़रूरी था। हालांकि, जैसा कि ऊपर बताया गया, जिस दस्तावेज़ पर उन्होंने भरोसा किया, वही उनके दावे के ख़िलाफ़ जाता है। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलटते हुए असल में मालिकाना हक़ साबित करने का दायित्व अपीलकर्ता पर डाल दिया, जो इस मामले के तथ्यों के आधार पर क़ानूनी रूप से सही नहीं है।”

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई और वक्फ़ ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया फ़ैसला बहाल कर दिया गया।

कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया,

“हमारी यह सुविचारित राय है कि विवादित संपत्ति 'सेवा इनाम' (Service Inam) ज़मीन है, जो एक धार्मिक संस्था से जुड़ी हुई और उस पर वक्फ़ संपत्ति का दर्जा लागू होता है। प्रतिवादी पक्ष कोई भी वैध मालिकाना हक़ या क़ानूनी कब्ज़ा साबित करने में नाकाम रहा है, जिसके आधार पर उसे माँगी गई राहतें मिल सकें।”

Cause Title: A.P. STATE WAKF BOARD THROUGH CHAIRPERSON VERSUS JANAKI BUSAPPA

24/04/2026

दूसरी शादी करने पर नौकरी से निकाला तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- यह 'चौंकाने वाला'

एक अहम फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को कहा कि हालांकि हिंदू धर्म में पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना जायज़ नहीं है। फिर भी ऐसा 'गलती' करने वाले किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकालने जैसी 'चौंकाने वाली' सज़ा नहीं दी जा सकती।

जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर की डिवीज़न बेंच ने संतोष चव्हाण को नौकरी पर वापस लेने का आदेश दिया। संतोष चव्हाण ने शुरू में बिलासपुर में रेलवे पुलिस फोर्स (RPF) में पुलिस कांस्टेबल के तौर पर जॉइन किया था और बाद में उनका ट्रांसफर ठाणे ज़िले के कल्याण में जूनियर क्लर्क के तौर पर हो गया। उन्हें इस आधार पर नौकरी से निकाल दिया गया था कि उन्होंने अपनी पहली शादी के रहते हुए भी दूसरी शादी की थी।

चव्हाण के वकील अभिनव चंद्रचूड़ के मुताबिक, चव्हाण ने 21 अप्रैल, 2008 को शादी की थी। हालांकि, कुछ अनबन की वजह से दोनों अलग हो गए और अब उनके बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। साल 2016 में चव्हाण ने दूसरी शादी की, जबकि उनकी पहली शादी अभी कानूनी तौर पर खत्म भी नहीं हुई। इसलिए उनके एम्प्लॉयर ने रेलवे सर्विस (कंडक्ट) रूल्स, 1968 का उल्लंघन करने के आरोप में चव्हाण के खिलाफ एक 'शुरुआती जांच' शुरू की।

जांच करने के लिए अधिकारी को नियुक्त किया गया, जिसने गवाहों और खुद चव्हाण के बयान दर्ज किए। फिर 1968 के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की। इसके बाद फरवरी, 2021 में RPF, कल्याण के असिस्टेंट सिक्योरिटी कमिश्नर ने यह देखते हुए कि चव्हाण की नौकरी के अभी कम से कम 19 साल बाकी हैं, उन्हें एक इंक्रीमेंट रोकने की सज़ा दी।

हालांकि, RPF की रिविजनल अथॉरिटी ने इस मामले का 'खुद से' (suo motu) संज्ञान लिया। साथ ही चव्हाण के खिलाफ एक नई जांच का आदेश दिया। साथ ही एक नया जांच अधिकारी भी नियुक्त किया।

अथॉरिटी ने नए अधिकारी से चव्हाण के लिए एक 'बड़ी' सज़ा की सिफारिश करने को कहा, क्योंकि पिछले अधिकारी ने एक 'छोटी' सज़ा की सिफारिश की थी। इसके बाद, चव्हाण को एक नई चार्जशीट जारी की गई और मार्च 2025 से उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश पारित किया गया।

अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए चव्हाण ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का रुख किया, लेकिन वहां से कोई राहत न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

Case Title: Santosh Motiram Chavan vs Union of India (Writ Petition 540 of 2025)

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