Sushil Shekhar

Sushil Shekhar

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06/22/2026

"राम के नाम लूट है, लूट सको तो लूट..."

कबीर की इस पंक्ति को शायद किसी ने बहुत गंभीरता से ले लिया।
जिस राम के नाम पर करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है, उसी राम के नाम पर चढ़ावे और दान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। SIT जांच कर रही है, आरोप गंभीर हैं, और जनता जवाब चाहती है।

अगर आरोप गलत हैं, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। अगर आरोप सही हैं, तो दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देशभर के लोग श्रद्धा से दान देते हैं, तो उस धन की सुरक्षा और पारदर्शिता की जिम्मेदारी किसकी है?
आस्था जनता की है, लेकिन जवाबदेही भी होनी चाहिए। राम मंदिर किसी दल, संगठन या व्यक्ति की संपत्ति नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। राम के नाम पर राजनीति बहुत हुई, राम के नाम पर वोट भी बहुत मिले, लेकिन अगर राम के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, करोड़ों लोगों के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

अब समय है कि जांच निष्पक्ष हो, पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हो और सच देश के सामने आए। जय श्री राम का नारा लगाने से पहले, राम के आदर्शों—सत्य, मर्यादा और न्याय—को भी याद रखना होगा।

06/12/2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए इसे "कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" बताया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आपराधिक आरोप नहीं था जिससे मनी लॉन्ड्रिंग या धोखाधड़ी का मामला बनता हो।

लेकिन सवाल सिर्फ कानूनी जीत का नहीं है।

वर्षों तक चली जांच, छापेमारी, बैंक खातों पर असर, संपत्तियों की जब्ती, पत्रकारों से पूछताछ और लगातार चलाए गए अभियानों ने न्यूज़क्लिक को गंभीर आर्थिक और संस्थागत नुकसान पहुँचाया। कई पत्रकारों, वीडियो संपादकों, तकनीकी कर्मचारियों और फ्रीलांस सहयोगियों की आजीविका प्रभावित हुई। जिन लोगों ने वर्षों तक जनता के मुद्दों को उठाया, उन्हें कानूनी अनिश्चितता और पेशेवर असुरक्षा का सामना करना पड़ा।

आज न्यूज़क्लिक अभी भी काम कर रहा है और अपनी पत्रकारिता जारी रखे हुए है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इतने वर्षों की कार्रवाई ने संस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है।

यदि अंत में अदालत यह कहती है कि मामला ही नहीं बनता था, तो क्या केवल बरी हो जाना पर्याप्त है? क्या उन पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान की कोई जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?

लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, सत्ता की प्रशंसा करना नहीं। यदि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल आलोचनात्मक मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह सिर्फ एक मीडिया हाउस पर हमला नहीं, बल्कि नागरिकों के जानने के अधिकार पर हमला है।

न्यूज़क्लिक का मामला हमें याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि संस्थाओं के व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।

सवाल पूछना देशद्रोह नहीं है। पत्रकारिता अपराध नहीं है।

06/04/2026

जब भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था, तब मीडिया चैनलों पर जश्न का माहौल था। घंटों तक बहसें हुईं, बड़े-बड़े दावे किए गए और इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया। लेकिन आज जब भारत का शेयर बाज़ार पूंजीकरण (Stock Market Capitalization) के आधार पर दुनिया में सातवें स्थान पर खिसक गया है, तब वही मीडिया लगभग खामोश क्यों है?

अगर चौथे स्थान की खबर हेडलाइन बन सकती है, तो सातवें स्थान पर फिसलने की खबर भी उतनी ही प्रमुखता से दिखाई जानी चाहिए। मीडिया का काम केवल सकारात्मक खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना नहीं, बल्कि जनता को पूरी और संतुलित तस्वीर दिखाना है।

हाल के दिनों में Bloomberg Economics की रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि रुपये पर दबाव को कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए RBI ने सोने से जुड़े लेनदेन किए। हालांकि RBI ने इस व्याख्या को खारिज किया और कहा कि उसके भौतिक स्वर्ण भंडार में कोई कमी नहीं आई है।

साथ ही यह भी सच है कि रुपये पर दबाव बढ़ा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली देखी गई और बाजार में अस्थिरता बनी रही। लेकिन इन मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी उपलब्धियों के समय होती है।

सवाल किसी सरकार या पार्टी का नहीं है। सवाल मीडिया की निष्पक्षता का है। यदि उपलब्धियों का श्रेय दिखाया जाता है, तो चुनौतियों और कमजोरियों पर भी उतनी ही ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए।

लोकतंत्र में पत्रकारिता का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि जनता को तथ्य बताना और सत्ता से जवाबदेही मांगना है।

04/16/2026

76 साल की उम्र में भी वही जुनून और समर्पण—यह पहचान है प्रणय रॉय की। भारतीय पत्रकारिता में उनका नाम विश्वसनीयता और गहराई के साथ जुड़ा हुआ है।

NDTV की स्थापना से लेकर उसे एक भरोसेमंद समाचार मंच बनाने तक उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। NDTV के मालिक से यहां तक पहुंचने की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन पत्रकारिता के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

इस उम्र में भी एक हाथ में मोबाइल से विजुअल लेते और दूसरे हाथ में माइक थामे, दिखाता है कि उनके अंदर आज भी वही पत्रकारिता का जुनून जिंदा है।

04/15/2026

बिहार की राजनीति में आज सचमुच एक युग का अंत महसूस होता है। जंगल राज से सुशासन तक का सफर सिर्फ बदलाव नहीं, एक नई पहचान की कहानी है। गड्ढों भरी सड़कों से चमचमाती राहों तक,
अंधेरे घरों से हर घर रोशनी तक, डर और अपराध के माहौल से कानून और व्यवस्था तक—यह परिवर्तन अपने आप नहीं आया, यह दूरदर्शी नेतृत्व और लगातार प्रयासों का परिणाम है।

आपने सिर्फ शासन नहीं किया, बल्कि बिहार को एक नई दिशा दी, एक नई सोच दी। विकास, विश्वास और व्यवस्था—इन तीन स्तंभों पर खड़ा आपका कार्यकाल हमेशा याद किया जाएगा।

आपके इस सफर को आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा के रूप में देखेंगी।
आपका योगदान इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।

Nitish Kumar

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