Mutahir
न हुस्न-ए-फ़िक़रा शराब कोई न नाम साहब सलाम साहब
उदास लब पर टिके हुए हैं ये जाम साहब सलाम साहब
नशा चढ़ा हो जो ज़िन्दगी का तो फिर जहन्नुम का डर नहीं है
तेरे ख़ुदा से शराबियों को क्या काम साहब सलाम साहब
सभी बिकें हैं बिकूँगा मैं भी मगर ये सिक्के नहीं चलेंगे
कहाँ मेरा क़द कहां ये कौड़ी के दाम साहब सलाम साहब
हमारी महफ़िल में इक सदी से न शाह बदले न शौक़ बदले
वही मुलाज़िम वही तकल्लुफ़ सलाम साहब सलाम साहब
कहीं पे अभिसार नाम लीजे तो नर्म रखिएगा अपना लहजा
बड़े सलीक़े से बोलियेगा ये नाम साहब सलाम साहब
अभिसार गीता शुक्ल
Abhishar Geeta Shukla
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पहले भी तू इक बार दग़ा दे के गया है
असली की जगह नक़ली दवा दे के गया है
कल रात अचानक वो तिरे फोन का आना
बुझते हुए शोलों को हवा दे के गया है
हम-शक्ल तो मिलते हैं तिरे तू नहीं मिलता
आंखों को मिरी कैसी सज़ा दे के गया है
देता है दुआ मुझको मगर लगती है तुझको
ये कौन से मसलक की दुआ दे के गया है
इस नाम का घर है न गली है न मुहल्ला
ये कौन सी बस्ती का पता दे के गया है
हसीब सोज़
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