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23/07/2025

“धनखड़ साहब धोखा दे गए?”

क्या उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने केंद्र सरकार को चौंका दिया?

जस्टिस वर्मा के खिलाफ केंद्र सरकार लोकसभा में महाभियोग लाने की तैयारी कर रही थी। योजना यह थी कि लोकसभा स्पीकर के नेतृत्व में न्यायिक सुधार की एक बड़ी मिसाल पेश की जाएगी। मगर इससे पहले ही राज्यसभा में एक बड़ा राजनीतिक धमाका हो गया।

राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने विपक्ष द्वारा जस्टिस वर्मा के खिलाफ लाए गए महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रस्ताव पर विपक्ष के 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। खास बात ये रही कि जब यह फैसला हुआ, उस समय राज्यसभा में जेपी नड्डा और अन्य वरिष्ठ मंत्री मौजूद नहीं थे—सिर्फ कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और जी. किशन रेड्डी मौजूद थे, जिनके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।

यानी बिना केंद्र को भरोसे में लिए, धनखड़ साहब ने विपक्ष की उस प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया, जिससे जस्टिस वर्मा को बचाने का रास्ता खुलता नजर आया।

केंद्र सरकार की मंशा थी कि जस्टिस वर्मा को हटाकर न्यायिक जवाबदेही की दिशा में कदम बढ़ाया जाए, लेकिन विपक्ष, जो पहले से ही वर्मा के बचाव में था, अब उपराष्ट्रपति की मदद से मैदान में आ गया। विपक्ष के इस प्रस्ताव को धनखड़ साहब ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि सरकार को समय पर जानकारी तक नहीं दी।

यह यहीं नहीं रुका।

विपक्ष प्रयागराज हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर यादव को भी हटाने की योजना में था, जिन्होंने VHP के मंच से ‘कट्टरपंथियों’ पर तीखा बयान दिया था। इस पर भी उपराष्ट्रपति धनखड़ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार हो गए थे—बिना केंद्र को बताए।

यानी केंद्र सरकार जहां जस्टिस वर्मा को हटाना चाहती थी, वहां VP साहब विपक्ष के साथ मिलकर उन्हें बचा रहे थे। और जस्टिस शेखर यादव, जिन्हें सरकार समर्थन दे रही थी, उन्हें हटाने की तैयारी थी।

ये घटनाएं भाजपा और संघ परिवार के लिए असहज थीं। जिस उपराष्ट्रपति को पार्टी ने खुद चुना था, वो अब पार्टी के खिलाफ खड़ा नजर आ रहा था। विपक्ष, जो पहले धनखड़ साहब की आलोचना करता था, अब उन्हें लोकतंत्र का रक्षक बताने लगा।

फिर क्या हुआ?

जैसे ही सरकार को पूरा मामला समझ आया, राजनाथ सिंह के ऑफिस में NDA सांसदों को बुलाकर कोरे कागज पर साइन कराए गए। यह एक संकेत था कि यदि जरूरत पड़ी, तो धनखड़ साहब के खिलाफ भी महाभियोग लाया जा सकता है।

रात 8 बजे धनखड़ साहब को ‘एक कॉल’ गया। बहस हुई। उन्हें बता दिया गया कि सांसद साइन कर चुके हैं। इसके बाद अचानक उन्होंने ‘स्वास्थ्य कारणों’ का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया।

प्रधानमंत्री मोदी, जो हमेशा विदाई पर भावुक भाषण देते हैं, इस बार बस इतना बोले कि “धनखड़ जी ने कई पदों पर काम किया है, शीघ्र स्वस्थ हों” — न कोई तारीफ, न कोई विदाई संदेश।

भाजपा के बाकी नेताओं ने भी चुप्पी साध ली।



अब सवाल ये है:

क्या धनखड़ साहब सच में केंद्र के साथ नहीं थे?
क्या वो विपक्ष की पिच पर खेल गए?
क्या भाजपा को अब समझ आना चाहिए कि आयातित नेताओं को नहीं, RSS की विचारधारा से जुड़े नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी देनी चाहिए?

80% से ज्यादा आयातित नेता या तो नाकाम रहे हैं, या समय आने पर विश्वासघात कर गए।

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