Shayerii

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10/19/2022

जब मिला वो ख़फा मिला हमको,
बख्त क्या चांद सा मिला हमको.

ग़ैर तो रहमदिल नहीं होते,
यार भी कज़ अदा मिला हमको.

चंद रंगीन तोहमतों के सिवा,
तेरी चाहत में क्या मिला हमको.

हमने ये राह छोड़ दी थी मगर,
तेरा दरबान आ मिला हमको.

चारासाज़ों का कोई जुर्म नहीं,
दर्द ही ला-दवा मिला हमको.

अहमद फ़राज़ साहेब

10/10/2022

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना,
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना.

हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद,
फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना.

अहमद फ़राज़

09/04/2022

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,
ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ.

फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया,
ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ.

मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे,
उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ.

इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको,
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ.

फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन,
इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूं.

राहत इन्दौरी....

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