New Raza Islamic Mission

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07/03/2026

#एअ़तिकाफ़_का_बयान

एअ़तिकाफ़ इस्लाम की एक बेहद अहम और मुबारक इबादत है, खास तौर पर रमज़ान के आख़िरी अशरे में इसकी बहुत ज्यादा फज़ीलत बयान की गई है। इस इबादत में बंदा दुनिया के कामों से अलग होकर मस्जिद में सिर्फ़ अल्लाह की इबादत, ज़िक्र और तिलावत में मशगूल हो जाता है।

क़ुरआन करीम में एअ़तिकाफ़

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

"और औरतों से संबंध न रखो जबकि तुम मस्जिदों में एअ़तिकाफ़ से बैठे हो।"

📗 (पारा 2, सूरह बक़रह, आयत 187)

एक और जगह मस्जिदों की अहमियत बयान करते हुए अल्लाह तआला फरमाता है:

और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं, तो अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो।

📗 (सूरह जिन्न, आयत 18)

इन आयतों से मालूम हुआ कि मस्जिद अल्लाह की इबादत का खास मकाम है और एअ़तिकाफ़ उसी इबादत का एक अहम तरीका है।

एअ़तिकाफ़ की हदीसों में फज़ीलत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

"मोअ़तकिफ़ (एअ़तिकाफ़ करने वाला) गुनाहों से बचा रहता है और उसे तमाम नेकियों का वही सवाब मिलता है जो नेक काम करने वालों को मिलता है।"

📕 (इब्न माजा, हदीस 1781)

एक दूसरी रिवायत में है कि:

मोअ़तकिफ़ ना तो किसी मरीज़ की इयादत को जा सकता है, ना जनाज़े में शामिल हो सकता है, ना किसी औरत को छू सकता है और ना मस्जिद से बाहर निकल सकता है।

📕 (अबू दाऊद, जिल्द 2, सफ़ह 492)

एअ़तिकाफ़ की बड़ी फज़ीलत

हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि
हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फरमाया:

"जिसने रमज़ान में दस दिनों का एअ़तिकाफ़ किया तो उसे दो हज और दो उमरे का सवाब मिलेगा।"

📙 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 146)

और उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं:

" नबी करीम ﷺ रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में एअ़तिकाफ़ फरमाते थे, यहाँ तक कि आपका विसाल हो गया।"

📕 (सहीह बुखारी, हदीस 2026)

एअ़तिकाफ़ की परिभाषा

मस्जिद में अल्लाह की रज़ा के लिए ठहरना एअ़तिकाफ़ कहलाता है।

📘 (बहारे शरीअत)

एअ़तिकाफ़ की तीन किस्में

1️⃣ वाजिब एअ़तिकाफ़

अगर किसी ने मन्नत मानी कि मेरा यह काम हो जाएगा तो मैं 1 या 2 या 3 दिन का एअ़तिकाफ़ करूंगा। तो जितने दिन की मन्नत मानी है उतने दिन का एअ़तिकाफ़ उस पर वाजिब हो जाएगा।

2️⃣ सुन्नते मुअक़्किदा एअ़तिकाफ़

रमज़ान के आख़िरी 10 दिनों का एअ़तिकाफ़।

यानि 20 रमज़ान को मगरिब के वक्त नीयत के साथ मस्जिद में दाखिल हो जाना।

यह सुन्नते मुअक्किदा अलल किफाया है।

यानि अगर पूरे शहर से एक आदमी भी एअ़तिकाफ़ में बैठ जाए तो सबकी तरफ से काफी है लेकिन अगर एक भी आदमी नहीं बैठा तो पूरे शहर के लोग गुनाहगार होंगे।

📘 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 147-148)

3️⃣ मुस्तहब एअ़तिकाफ़

जब भी मस्जिद में दाखिल हों तो यह नीयत कर लें:

"नवैतु सुन्नतल एअ़तिकाफ़"

तो जब तक मस्जिद में रहेंगे एअ़तिकाफ़ का सवाब मिलता रहेगा।

📘 (बहारे शरीअत)

औरतों का एअ़तिकाफ़

मर्दों के लिए मस्जिद में एअ़तिकाफ़ करना ज़रूरी है।

लेकिन अगर औरत एअ़तिकाफ़ करना चाहे तो वह घर में जिस जगह नमाज़ पढ़ती है उसी जगह एअ़तिकाफ़ में बैठ सकती है।

📗 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 129)

अगर घर में नमाज़ की जगह मुक़र्रर नहीं है तो पहले किसी जगह को नमाज़ के लिए खास कर ले, फिर वहीं एअ़तिकाफ़ करे।

📕 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 147)

एअ़तिकाफ़ के लिए रोज़ा

रमज़ान के एअ़तिकाफ़ के लिए रोज़ा रखना शर्त है।

अगर रोज़ा नहीं रखा तो वह नफ्ल एअ़तिकाफ़ होगा, सुन्नत नहीं।

📙 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 148)

मन्नत के एअ़तिकाफ़ में रोज़ा

अगर किसी ने मन्नत मानी कि:

"मैं एक महीने का एअ़तिकाफ़ करूंगा मगर रोज़ा नहीं रखूंगा"

तो फिर भी रोज़ा रखना वाजिब होगा।

📘 (बहारे शरीअत)

औरत की मन्नत और शौहर

अगर औरत ने एअ़तिकाफ़ की मन्नत मानी तो शौहर उसे रोक सकता है।

अगर रोक दिया तो वह तलाक़ के बाद या शौहर की मौत के बाद मन्नत पूरी करेगी।

अगर शौहर ने इजाज़त दे दी तो अब उसे रोक नहीं सकता।

📗 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 149)

एअ़तिकाफ़ टूटने का हुक्म

अगर मोअ़तकिफ़ मस्जिद से बाहर निकल गया तो एअ़तिकाफ़ टूट जाएगा और उसकी कज़ा वाजिब होगी।

📕 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 150)

इसी तरह औरत भी अगर घर से बिना शरई वजह के बाहर निकले तो उसका एअ़तिकाफ़ टूट जाएगा।

📙 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 132)

मस्जिद से बाहर निकलने के जायज़ उज़्र

मोअ़तकिफ़ दो वजहों से मस्जिद से बाहर जा सकता है।

1️⃣ हाजते शरई

जैसे:

जिस मस्जिद में एअ़तिकाफ़ है वहां जुमा नहीं होता
जुमा पढ़ने बाहर जाना
अज़ान देने के लिए मीनार पर जाना

2️⃣ हाजते तबई

जैसे:

पेशाब
पाखाना
वुज़ू
ग़ुस्ल

अगर मस्जिद में इनका इंतज़ाम नहीं है।

📘 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 150)

मोअ़तकिफ़ के लिए जरूरी बातें

मोअ़तकिफ़ को चाहिए कि:

फालतू बातों से बचे
ज़िक्र व तिलावत में लगे
नफ्ल नमाज़ ज्यादा पढ़े

हाँ अगर लोगों को दीन की तालीम देने के लिए महफ़िल करता है तो इसकी इजाज़त है।

📗 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 135)

मस्जिद में खाना पीना

मस्जिद में मोअ़तकिफ़ के अलावा दूसरों के लिए खाना पीना नाजायज़ है।

इसलिए जो लोग मस्जिद में अफ़्तार करते हैं उन्हें चाहिए कि एअ़तिकाफ़ की नीयत करके बैठें,
वरना गुनाहगार होंगे।

📕 (अलमलफूज़, हिस्सा 2, सफ़ह 108)

✅ नतीजा:
एअ़तिकाफ़ एक ऐसी इबादत है जो बंदे को अल्लाह के करीब कर देती है। खास तौर पर रमज़ान के आखिरी दस दिनों में एअ़तिकाफ़ करना सुन्नते मुअक्किदा है, इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि इस मुबारक इबादत की अहमियत को समझे और अपनी जिंदगी में इसे अपनाए।

19/02/2026

📢 ज़कात से जुड़ा अहम पैग़ाम – ज़िम्मेदारी और हिकमत के साथ

अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि व बरकातुहू 🌙

रमज़ान और ज़कात का मुक़द्दस वक़्त क़रीब आते ही कुछ “प्रोफेशनल भिखारी” और ज़कात के नाम पर धोखाधड़ी करने वाले गिरोह अपने-अपने बैग पैक कर लेते हैं। बड़े शहरों — दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, कलकत्ता — का रुख़ करते हैं और सोशल मीडिया पर जज़्बाती फोटो, QR कोड और अपीलें वायरल होने लगती हैं।

ऐसे माहौल में हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि अपनी ज़कात को समझदारी और तहक़ीक़ के साथ अदा करें।

🔹 ज़कात अपने हाथ से असली मुस्तहिक़ तक पहुँचाएँ।
मुस्तहिक़ कोई दूर शहर में ही हो, ज़रूरी नहीं — वो आपका रिश्तेदार भी हो सकता है, आपका पड़ोसी भी, या आपके अपने मोहल्ले, गांव, शहर का कोई ज़रूरतमंद परिवार।

🔹 अपने इलाक़े में तलाश कीजिए कि असल हक़दार कौन है।
– किसी पर मजबूरी में क़र्ज़ हो गया हो (ना कि जुआ, शराब या हराम कामों की वजह से), तो उसका क़र्ज़ अदा कर दीजिए।
– किसी बेवा (जिसका शौहर नहीं है) का घर जर्जर हालत में हो, तो उसकी मरम्मत या बनवाने में मदद कर दीजिए।
– जिन बच्चों के सर से बाप का साया उठ गया है, उन यतीमों की साल भर की स्कूल फीस भर दीजिए।
– किसी ग़रीब मगर मेहनती और नेक छात्र की कॉलेज या यूनिवर्सिटी की सालाना फीस अदा कर दीजिए, ताकि वो पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो सके और कल को क़ौम की ख़िदमत कर सके।

🔹 ज़कात को रोज़गार का ज़रिया बनाइए।
अगर मुमकिन हो तो किसी ज़रूरतमंद को छोटा कारोबार शुरू कराने में मदद कीजिए, ताकि वह अगले साल लेने वालों में नहीं, बल्कि देने वालों में शामिल होने का जज़्बा रखे।

अफ़सोस की बात है कि हम साल-दर-साल बिना जाँच-पड़ताल के ज़कात देते रहते हैं, और हालात जस के तस रहते हैं। कुछ फर्जी संस्थाएँ और मदरसों के नाम पर चंदा खाने वाले लोग खुद भी फायदा उठाते हैं और मासूम बच्चों को भी चंदा माँगने पर मजबूर करते हैं।

याद रखिए —
जो असली और खामोशी से दीन की ख़िदमत करने वाले इदारे होते हैं, वे दर-दर रसीद लेकर नहीं फिरते। अल्लाह तआला अपने नेक बंदों के ज़रिए उनकी मदद खुद पहुँचा देता है।

🌟 ज़कात ऐसे लोगों को दीजिए जो आगे चलकर खुद ज़कात देने वालों में शामिल होने का हौसला रखते हों, न कि ज़कात के आदि बन जाएँ।

अगर हर मुसलमान अपनी ज़कात अपने ही इलाके में सही तरीके से खर्च करे, तो इंशा अल्लाह हर शहर और गांव की ग़ुरबत कम हो सकती है।

आइए, इस बार ज़कात सिर्फ़ एक फ़र्ज़ की अदायगी न रहे, बल्कि समाज की बेहतरी और तरक़्क़ी का ज़रिया बने।

अल्लाह तआला हमें सही समझ, ईमानदारी और हिकमत के साथ ज़कात अदा करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आमीन 🤲

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01/02/2026

आज इस्लाम किताबों में है दीवारों पर है पोस्टर और प्रोफ़ाइल में है लेकिन घरों से ग़ायब होता जा रहा है, नमाज़ पढ़ने वाले बहुत हैं लेकिन ग़ैरत वाले मर्द कम होते जा रहे हैं

सबसे बड़ा फ़ितना आज क्या है

दय्यूस बाप और दय्यूस भाई जिस बाप को बेटी की बेहयाई पर शर्म न आए जिस भाई को बहन की बेपर्दगी पर ग़ुस्सा न आए, जिस शौहर को बीवी के ग़ैर मर्दों के सामने सजने पर एतराज़ न हो वो मर्द नहीं सिर्फ़ ज़िंदा लाश है

रसूलुल्लाह صلی الله عليه وسلم ने दय्यूस को जन्नत से महरूम बताया

और आज उसी दय्यूस को मॉडर्न ओपन माइंडेड समझदार कहा जा रहा है आज बाप कहता है, ज़माना बदल गया है आज भाई कहता है उसकी लाइफ़ है आज शौहर कहता है भरोसा होना चाहिए

नहीं ये भरोसा नहीं बेज़मीर खामोशी है ये समझदारी नहीं कायरता है ये तरक़्क़ी नहीं दीन से ग़द्दारी है, सोशल मीडिया ने बेहयाई को इबादत बना दिया है रील्स के लिए बेटी की अदाएँ लाइक्स के लिए बहन की तस्वीरें फॉलोअर्स के लिए बीवी का जिस्म

और बाप भाई फ़ख़्र से कहते हैं मेरी बेटी वायरल है अरे नादान वो वायरल नहीं नीलाम हो रही है, जिस घर में मर्द हया का दुश्मन बन जाए उस घर में अल्लाह की रहमत नहीं अज़ाब का डर होता है, इस्लाम औरत को क़ैद नहीं करता इस्लाम औरत को हिफ़ाज़त देता है

हिजाब पिछड़ापन नहीं ग़ैरत ज़ुल्म नहीं निगरानी जुल्म नहीं ये सब ईमान की निशानी हैं, और याद रखो अगर ये बातें चुभ रही हैं तो समझ लो बात सही जगह लगी है, क्योंकि हक़ हमेशा कड़वा होता है और दय्यूस को हक़ सबसे ज़्यादा चुभता है

अब भी वक़्त है मर्द बनो बाप रहबर बनो भाई हिफ़ाज़त करने वाला बनो, और इस्लाम को सिर्फ़ नाम नहीं ज़िंदगी बनाओ.!

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Channel Owner: ✍️ Muhammad Junaid Raza Ashrafi

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