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25/05/2026

बिहार के विश्वविद्यालयों में एडमिशन से रिजल्ट तक सब ऑनलाइन, राज्यपाल का फैसला

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पटना. बिहार के उच्च शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और सत्रों को नियमित करने के लिए लोकभवन (राजभवन) ने कमर कस ली है. इसी क्रम में बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के लिए कई बड़े और कड़े फैसले लिए हैं. इस नई व्यवस्था के तहत अब बिहार के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘समर्थ पोर्टल’ को मिशन मोड में लागू करना अनिवार्य कर दिया गया है. इसके साथ ही पोर्टल पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहन के रूप में 1 लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी दी जाएगी.

समर्थ पोर्टल से ही होंगे सारे काम
कुलाधिपति कार्यालय की ओर से जारी निर्देशों के मुताबिक अब विश्वविद्यालयों के तमाम प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य केवल समर्थ पोर्टल के माध्यम से ही ऑनलाइन किए जाएंगे. इसमें विद्यार्थियों के नामांकन से लेकर परीक्षा फॉर्म भरने, एडमिट कार्ड जारी करने और परिणाम (रिजल्ट) प्रकाशन तक के सभी कार्य शामिल हैं. इसके अतिरिक्त शिक्षकों और कर्मचारियों की उपस्थिति की निगरानी, उनके अवकाश का प्रबंधन, सेवा संबंधी मामले और मासिक वेतन का भुगतान भी इसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से निपटाया जाएगा.

मुख्य बदलाव और नई व्यवस्थाएं
समर्थ पोर्टल अनिवार्य: विवि के सभी कार्य अब इसी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन संचालित होंगे.

निगरानी अधिकारियों की तैनाती: सतर्कता और पारदर्शिता के लिए हर विवि में मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) नामित होंगे.

अकादमिक कैलेंडर का पालन: नामांकन, परीक्षा और परिणाम का काम अब सख्त समय-सीमा के तहत होगा.

एक लाख का पुरस्कार: समर्थ पोर्टल पर सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहन राशि दी जाएगी.

मुख्य सतर्कता अधिकारी करेंगे निगरानी
विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और कामकाज में पूरी सतर्कता बरतने के लिए एक और बड़ा कदम उठाया गया है. अब राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) नामित किए जाएंगे. ये अधिकारी विश्वविद्यालयों के दैनिक कार्यों और वित्तीय लेन-देन पर कड़ी नजर रखेंगे. कुलाधिपति ने साफ किया है कि विश्वविद्यालय सार्वजनिक धन के उपयोग के लिए पूरी तरह जवाबदेह होंगे और उन्हें सरकार से मिलने वाले अनुदान का समय पर उपयोगिता प्रमाण-पत्र (यूसी) देना होगा.

बिहार के उच्च शिक्षा क्षेत्र में लेटलतीफी को खत्म करने के लिए शैक्षणिक कैलेंडर का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया गया है. समय पर परीक्षाएं आयोजित कराने और तय समय-सीमा के भीतर परिणाम घोषित करने को प्राथमिकता दी गई है ताकि छात्रों का सत्र देर न हो और उनका भविष्य सुरक्षित रहे.

छात्राओं को समय पर मिलेगी प्रोत्साहन राशि
मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना के तहत स्नातक पास करने वाली छात्राओं को मिलने वाली 50-50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि के भुगतान में अब देरी नहीं होगी. इस प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज बनाने के लिए साल 2025 तक स्नातक उत्तीर्ण करने वाली सभी योग्य छात्राओं का पूरा डाटा समर्थ पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है. डाटा ऑनलाइन होने से अब छात्राओं के बैंक खातों में बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे राशि भेजी जा सकेगी.

छात्राओं के लिए विशेष घोषणा
50-50 हजार रुपए की राशि: स्नातक पास छात्राओं को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का समय पर भुगतान होगा.
डाटा अपलोड: इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए साल 2025 तक स्नातक पास सभी छात्राओं का डाटा पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है.

बिहार उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव
राज्यपाल के निर्णय से साफ है कि बिहार में पहली बार विश्वविद्यालयों की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की कोशिश हो रही है. इससे रिकॉर्ड प्रबंधन और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी. ऐसे में लोकभवन के इस चौतरफा डिजिटल रिफॉर्म से बिहार के लाखों छात्र-छात्राओं को सीधे लाभ मिलने की उम्मीद है. शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव आने वाले दिनों में राज्य के विश्वविद्यालयों की सूरत बदलने में मील का पत्थर साबित हो सकता है.

23/05/2026

बसु-ममता नहीं कर पाए, अब सुवेंदु दादा केरंगे, कोलकाता एयरपोर्ट से हटेगी मस्जिद

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कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति बदलते ही अब उन मुद्दों पर भी तेजी दिखने लगी है, जो दशकों तक फाइलों और विवादों में दबे रहे. कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट के भीतर मौजूद 136 साल पुरानी गौरीपुर जामे मस्जिद को लेकर फिर से हलचल तेज हो गई है. यह वही मस्जिद है, जिसे लेकर पिछले करीब 30 साल से केंद्र सरकार और एयरपोर्ट अथॉरिटी लगातार चिंता जताती रही थी. लेकिन हर बार मामला धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक टकराव के कारण आगे नहीं बढ़ पाया. अब बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तस्वीर बदलती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक नई सरकार और केंद्र के बीच तालमेल बढ़ने के बाद मस्जिद को एयरपोर्ट परिसर से बाहर शिफ्ट करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है. यही वजह है कि प्रशासन, एयरपोर्ट अथॉरिटी और जिला अधिकारियों की लगातार बैठकें हो रही हैं. सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं है, बल्कि एयरपोर्ट सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय एविएशन नियमों और बंगाल की नई राजनीतिक दिशा का भी बन चुका है.

कोलकाता एयरपोर्ट के भीतर मौजूद 136 साल पुरानी मस्जिद को शिफ्ट करने की प्रक्रिया तेज हुई.

दिलचस्प बात यह है कि यह मस्जिद एयरपोर्ट बनने से भी पहले की बताई जाती है. स्थानीय लोग इसे बांकड़ा मस्जिद के नाम से जानते हैं. मस्जिद रनवे के बेहद करीब मौजूद है और इसी कारण एयरपोर्ट संचालन में लंबे समय से दिक्कतें आ रही हैं. एविएशन अधिकारियों का दावा है कि मस्जिद की वजह से सेकेंडरी रनवे का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा. बड़े इंटरनेशनल विमानों की लैंडिंग और आधुनिक ILS सिस्टम लगाने में भी रुकावट बनी हुई है. यही कारण है कि एयरपोर्ट अथॉरिटी लंबे समय से इसे दूसरी जगह शिफ्ट करने का प्रस्ताव देती रही. अब सूत्र बता रहे हैं कि ईद-उल-अजहा के बाद इस मुद्दे पर बड़ा फैसला हो सकता है. हालांकि प्रशासन फिलहाल इसे पूरी तरह आपसी सहमति और शांति के साथ हल करने की रणनीति पर काम कर रहा है. मस्जिद कमेटी से भी कई दौर की बातचीत हो चुकी है और अगले हफ्ते फिर अहम बैठक होने की संभावना है.

सुवेंदु अधिकारी पहले भी सार्वजनिक रूप से एयरपोर्ट सुरक्षा और ऑपरेशनल दिक्कतों का मुद्दा उठा चुके हैं.

एयरपोर्ट सुरक्षा बनाम धार्मिक ढांचा, अब तेज हुई हलचल
कोलकाता एयरपोर्ट के भीतर मौजूद यह मस्जिद सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एयर ट्रैफिक ऑपरेशन के लिए भी बड़ी चुनौती मानी जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ढांचा एयरपोर्ट की बाउंड्री वॉल से करीब 150 मीटर अंदर और सेकेंडरी रनवे से सिर्फ 165 मीटर की दूरी पर मौजूद है. अंतरराष्ट्रीय एविएशन नियमों के अनुसार सक्रिय रनवे के 240 मीटर के दायरे में कोई स्थायी निर्माण नहीं होना चाहिए. इसी वजह से एयरपोर्ट अधिकारियों को रनवे के टचडाउन पॉइंट को 88 मीटर पीछे शिफ्ट करना पड़ा था.
हालांकि मौजूदा रनवे छोटे और मीडियम साइज के विमानों के लिए पर्याप्त है, लेकिन बोइंग 787 और एयरबस A330 जैसे बड़े विमानों के संचालन में परेशानी आती है. एयरपोर्ट सूत्रों का कहना है कि अगर यह बाधा हटती है तो कोलकाता एयरपोर्ट की इंटरनेशनल क्षमता और बढ़ सकती है. यही नहीं, कोहरे के दौरान इस्तेमाल होने वाला एडवांस ILS सिस्टम भी इस क्षेत्र में पूरी तरह इंस्टॉल नहीं हो पाया है. इससे सर्दियों में फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित होते हैं.

30 साल तक क्यों अटका रहा मामला?
एयरपोर्ट अथॉरिटी ने पहली बार इस मस्जिद को शिफ्ट करने का प्रस्ताव करीब तीन दशक पहले दिया था. उस दौरान ज्योति बसु सरकार थी. इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य और फिर ममता बनर्जी सरकार के समय भी यह मुद्दा उठा, लेकिन हर बार राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया. प्रशासन को डर था कि किसी भी जल्दबाजी से तनाव पैदा हो सकता है.
अब सत्ता परिवर्तन के बाद माहौल बदला हुआ दिखाई दे रहा है. नई सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रही है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पहले भी सार्वजनिक रूप से एयरपोर्ट सुरक्षा और ऑपरेशनल दिक्कतों का मुद्दा उठा चुके हैं. सूत्रों का दावा है कि केंद्र और राज्य के बीच समन्वय बढ़ने के बाद अब इस प्रोजेक्ट को गंभीरता से आगे बढ़ाया जा रहा है.

मस्जिद कमेटी ने क्या कहा?

सूत्रों के मुताबिक मस्जिद कमेटी ने भी बातचीत में सहयोग का संकेत दिया है. कमेटी का कहना है कि वे एयरपोर्ट के विकास और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन वे चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक और सहमति के साथ हो. कमेटी ने यह भी मांग रखी है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों से भी राय ली जाए.

फिलहाल प्रशासन वैकल्पिक जमीन और नई मस्जिद के ब्लूप्रिंट पर काम कर रहा है. बताया जा रहा है कि नई जगह पहले से ज्यादा बड़ी और सुविधाजनक हो सकती है. अधिकारियों की कोशिश है कि ईद के बाद इस मुद्दे पर सहमति का अंतिम फार्मूला तैयार कर लिया जाए.

हाई सिक्योरिटी के बीच होती है नमाज
मौजूदा समय में इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था अपनाई जाती है. नमाजियों को CISF की जांच से गुजरना पड़ता है. इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट के हाई सिक्योरिटी जोन के भीतर बस से मस्जिद तक ले जाया जाता है. रोजाना 10 से 25 लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं, जबकि शुक्रवार को यह संख्या 80 तक पहुंच जाती है.

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि एयरसाइड के भीतर किसी भी सिविलियन मूवमेंट से ऑपरेशन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. यही कारण है कि लंबे समय से इसे सुरक्षा जोखिम भी माना जाता रहा है. एयरपोर्ट प्रशासन चाहता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति पूरी तरह खत्म हो और रनवे क्षेत्र पूरी तरह प्रतिबंधित जोन बना रहे.
क्या बंगाल में अब बदल रही है राजनीति की दिशा?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ एयरपोर्ट या मस्जिद का मुद्दा नहीं है. यह बंगाल की नई राजनीतिक कार्यशैली का संकेत भी माना जा रहा है. भाजपा लंबे समय से इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा के मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात करती रही है. अब जब राज्य और केंद्र की सोच एक दिशा में दिखाई दे रही है, तो कई पुराने विवादित प्रोजेक्ट्स भी तेजी पकड़ सकते हैं.

हालांकि विपक्ष इस पूरे मामले को राजनीतिक नजरिए से भी देख रहा है. उनका कहना है कि धार्मिक मामलों में सरकार को बेहद संतुलन और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ना चाहिए. आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का बड़ा विषय भी बन सकता है.