History Hour
दिल को सुकून बख़्शने वाला ये खूबसूरत मंज़र ताजमहल की मस्जिद में ईद उल अज़हा की नमाज़ के बाद का है, जहां लोग नमाज से फारिग होने के बाद इस खूबसूरत इमारत का लुत्फ उठा रहे हैं और फोटोज और वीडियोज बना रहे हैं।
समूगढ़ का मैदान, दो शहज़ादे, एक तख़्त। इस जंग ने मुग़ल सल्तनत का भविष्य तय कर दिया और इतिहास का रुख़ हमेशा के लिए बदल गया.....
ताजमहल में ईद-उल-अज़हा की नमाज़ का ज़िक्र आते ही मुझे हमेशा एक पुराना किस्सा याद आता है।
कहा जाता है कि जब शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया, तो उसने सिर्फ़ एक मक़बरा नहीं बनवाया था। उसने चाहा था कि ये जगह ऐसी बने जहाँ मोहब्बत के साथ-साथ इबादत की रूह भी हमेशा ज़िंदा रहे।
इसी वजह से ताजमहल के पश्चिमी हिस्से में लाल पत्थर की एक खूबसूरत मस्जिद तामीर कराई गई, जहाँ आज भी नमाज़ अदा की जाती है।
पुराने सफ़रनामों में ज़िक्र मिलता है कि ईद के दिनों में आगरा के लोग सुबह-सुबह यमुना किनारे जमा होने लगते थे। सफेद कपड़ों में लोग, बच्चों की आवाज़ें, इत्र की खुशबू और दूर से सुनाई देती अज़ान… पूरा माहौल बदल जाता था।
लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि 1658 में जब शाहजहाँ को उसके बेटे औरंगज़ेब ने आगरा किले में नज़रबंद कर दिया, तब उसकी ज़िंदगी के आख़िरी साल उसी किले में गुज़रे।
इतिहासकार लिखते हैं कि वह अपनी खिड़की से दूर ताजमहल को देखा करता था वही ताज, जहाँ कभी शाही रौनकें और ईद की नमाज़ें हुआ करती थीं।
सोचिए…
जिस बादशाह ने इस जगह को बनवाया, आख़िर में वही उसे दूर से देखने पर मजबूर हो गया।
आज जब ताजमहल में ईद-उल-अज़हा की नमाज़ होती है, तो वो सिर्फ़ एक धार्मिक मंज़र नहीं लगता।
उसमें मुग़ल दौर की वो पूरी कहानी छुपी महसूस होती है शान, इबादत, मोहब्बत और वक्त की बेवफाई।
और शायद इसी लिए ताजमहल में गूंजती “अल्लाहु अकबर” की आवाज़ लोगों को सिर्फ़ सुनाई नहीं देती, महसूस भी होती है।
References:
• Ebba Koch — The Complete Taj Mahal, Pages 28, 231-235
• Rana Safvi — Shahjahanabad, Page 41
• Abdul Hamid Lahori — Badshahnama (translated edition), Vol. 1, Pages 402-405
ताजमहल में ईद उल अज़हा की नमाज़ पढ़ते अकबराबाद के बाशिंदे
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