Dr.Gunshekhar
मेरे बाबू जी
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मेरे बाबू जी!आपको द्युलोक गए हुए छह दिन हो रहे हैं।सोचा था स्वप्न में ही सही दर्शन तो दोगे ही।आप स्वप्न में भी नहीं आए पर आपको निर्मोही कहने का साहस मुझमें नहीं है।मेरी आँखें इतनी भरी हैं कि आपकी छवि उसमें डूब सकती है।इसलिए उनके तटबंधों को टूटके आँसुओं के साथ बह जाने दे रहा हूँ ताकि छवि को डूबने का खतरा न रहे।
हे मानस-पिता!आपने जो मुझे दिया है,वह भाई श्री दीनानाथ द्विवेदी'रंग',भाई श्री हरिनाथ द्विवेदी या बहिन
डॉo मानसी द्विवेदी को भी नहीं दिया है।श्रीगौतम बुद्ध चरित महाकाव्य के टीकाकार के रूप में आपके साथ -साथ मैं भी यात्रा करूँगा।मैं आप सदृश तथागत का 'आनंद'होने का अधिकारी नहीं था फिर भी आपने मुझ कुपात्र को वह दर्ज़ा दिला दिया।
मुझे पता है कि कोई भी रचयिता अपने महाकाव्य के साथ उसकी टीका नहीं छपवाता लेकिन आपने मेरे मोह वश टीका सहित प्रकाशित कराने का संकल्प लिया।खैर!आपके जीवनकाल में ही आपका यह संकल्प पूरा हुआ।श्री गौतम बुद्ध शोध संस्थान( संस्कृति मंत्रालय),लखनऊ, उo प्रo ने उसे टीका सहित प्रकाशित किया।इसी के साथ उसका भव्य लोकार्पण भी हुआ।
आप आजीवन शुद्ध रहे हैं।बुद्ध रहे हैं।बस आपको कोई आनंद नहीं मिला।मुझ जैसे कुपात्र को अवसर भी दिया पर वह निरर्थक ही रहा। समर्पण के बिना आखिर कोई आनंद कैसे बन पाएगा।अगर आनंद नहीं चाहते तो बुद्ध भी आनंद को आनन्द नहीं बना पाते।
बाबू जी!आपने चालीस दिनों तक असह्य पीड़ा झेली।बहुत संभव है कि 'संसार दु:ख का कारण है' कहने वालेअपने काव्य -नायक को सही ठहराने के लिए ऐसा किया हो।दूसरों के दु:ख पर मोम- सा पिघल कर बह पड़ने वाले बाबू जी!आप इतने निर्मोही कैसे हो गए कि न जाने कितनी आँखें झरीं झरती रहीं पर आप आँखें मूँदे रहे।रंच भी नहीं पसीजे।भैया मत रोओ जैसा स्वर भी नहीं फूटा।आज भी ये आँखें झरने- सी झर रही हैं पर आपके हाथ आगे नहीं बढ़ रहे हैं।आप तो उड़ चले पर नीड़ में प्रतीक्षारत बच्चों के वास्ते लौटना भी था यह भूल गए।अब ऐसा लगता है कि जैसे आपके परों की परवाज़ कहीं लुट गई है।शायद आप मोह से मुक्ति पाकर परम हंस हो गए हैं। इसीलिए तो आपको लौटने की परवाह ही नहीं है।
आप अक्षत अक्षर कवि रहे हैं और मेरे पास आपको भेंट करने के लिए कुछ भी ऐसा नहीं है जो अक्षत हो,अक्षर हो।अगर होता भी तो पहुँचाने की ताकत कहाँ से लाता। इसीलिए सोचता हूँ कि अपनी छोटी माँ (चाची) की मृत्यु पर लिखा दोहा ही क्यों न आपको
भेंट कर दूँ -
जब तक पंछी नीड़ में,तब तक छोह-बिछोह।
पाँख खोल जब उड़ चले,फिर काहे का मोह।।
डॉo गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'
कविता का कोठा उद्योग
-डा० गुणशेखर
आज इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि काव्य मंचों की गरिमा गिरी है। उसके अनेक कारण हैं।लेकिन इस पतन का सबसे बड़ा कारण है हर वर्ग में व्यापा सत्ता के साथ-साथ कंचन, कामिनी और कीर्ति का लोभ।
सामाजिक रुझान का ध्यान रखकर टी आर पी बढ़ाने में कवि भी लग गया है। इसके लिए उसे भाँड़ बनने से भी गुरेज़ नहीं है।
क्या इसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है कि ज़्यादातर मंच किसी न किसी रूप में किसी न किसी दल या विचारधारा विशेष के लिए समर्पित होते हैं। इनका संयोजक प्रायः कोई न कोई क्षेत्रीय कवि अथवा व्यापारी होता है, जिसका संरक्षक तथाकथित बड़ा कवि/दलाल या फिर अखिल भारतीय संयोजक होता है, जो एक मोटी रकम लेकर उस आयोजन में खुद भी आता है।
अब छोटे-छोटे नहीं बड़े-बड़े चंदे लिए जाते हैं। अतः संयोजक दर-दर भटकने के बजाय किसी दल के दलदल में घुसे किसी सेठ या सेठों से प्राप्त रकम से आयोजन करता है।
यह आलेख इसलिए रूप ले सका कि बहुत अरसा पहले अपने एक साक्षात्कार में डॉ. सरिता शर्मा ने मंच से केवल अपनी असहति ही दर्ज नहीं की थी अपितु उसकी खामियों पर भी वे कुछ बोल सकी थीं। उस समय यह टिप्प्णी के रूप में था और उन्हीं की पोस्ट पर चस्पा कर दिया गया था। बाद में इसने आलेख का रूप ले लिया।
परंपरागत कवि सम्मेलन तीन तरह के रहे हैं। पहला स्थानीय, दूसरा क्षेत्रीय और तीसरा विराट या अखिल भारतीय। अब तो अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों की भी भरमार है। इनके प्राय: दो संयोजक होते हैं एक राष्ट्रीय दूसरा स्थानीय संयोजक। अब तीसरा भी है यानी अंतरराष्ट्रीय संयोजक।
हर संयोजक नई कवयित्री के साथ-साथ तीन-चार चरण वंदक चाटुकार भी बुलाता या लाता ले जाता है, जो वाह क्या बात है... के साथ बीच-बीच में भोंडे से भोंडे तरीके से उठ- उठकर आस-पास गिरी-पड़ी मालाएँ कवियों को पहनाते रहते हैं।
राष्ट्रीय संयोजक स्वयं लाख-दो लाख से लेकर पाँच लाख तक लेता है और चरण वंदक से पाँच -दस हज़ार में अपनी पूजा भी करवाता है और काव्यपाठ भी। अन्तरराष्ट्रीय संयोजक पंद्रह से बीस - बाईस लाख ले मारता है। इंसेंटिव या बोनस के रूप में संचालन पर प्राय: इसी का कब्ज़ा रहता है।
बेटी की उमर की (कभी-कभी पोती की भी) कवयित्री के साथ रोमांस का अधिकार इसी संचालक का होता है। कवयित्री भी इसके साथ शाब्दिक ही सही पर रोमांस की होली में रंग भी जाती है और बाप-दादा तक के गाल पर रंग लगाने में संकोच नहीं करती।
सही पूछो तो मंच कविता के हत्यारे होते जा रहे हैं। केवल मंच ही नहीं, न्यूज़ और अन्य चैनल भी इसके शिकार हैं।इक्का- दुक्का को छोड़ दें तो इधर कुछ चैनल तो हद ही किए दे रहे हैं। इन सबके बीच गनीमत है कि आज भी आदरणीया डॉ. सरिता शर्मा और डॉ. कीर्ति काले जैसी कुछ कवयित्रियाँ शेष हैं लेकिन अपने मयार की पाँच कवयित्रियाँ ये भी नहीं खोज पाएँगी जबकि मंच पर हैं सैकड़ों। इन डॉ. सरिता और डॉ. कीर्ति के जैसों ने ही मंच और घरों को भी बचा रखा है वर्ना मंचीय कवियों का घरों में प्रवेश निषिद्ध हो जाता।
अच्छे-अच्छे मंचों पर भी कभी संचालक और किसी कवयित्री के काव्य-पाठ के बीच का संवाद इतना भोंड़ा हो जाता है कि रस भंग क्या रस परिवर्तन तक हो जाता है। कवयित्री का शृंगार वीभत्स में बदल जाता है।
इक्कीसवीं सदी का कुमार विश्वास जैसा करोड़ों का कवि(व्यक्तियों और रुपयों दोनों का) एक बार सूरत में इधर-उधर किलकारी मारते घूमते बच्चों को अँधेरे की पांडुलिपियाँ ही नहीं कह रहा था अपितु उन्हें समेट लेने की हिदायत भी दे रहा था। जिस तरह से वह महाकवि सृष्टि को अँधेरे से जोड़ते हुए अश्लील बनाकर उन बच्चों का मज़ाक उड़ा रहा था, वह मुझे बच्चों का नहीं कविता का अँधेरा लगा। उस समय के कवि और आज के कथावाचक वह आचरण मुझे
बहुत ही वीभत्स लगा था।
नैतिकता की सदी यानी बीसवीं सदी में भी सूँड़ फैज़ाबादी जैसा कवि 'घाघरा को खतरे के निशान से ऊपर कहकर /काव्य नायिका के प्रीतम को परदेस से वापस बुला रहा था। 'साथ में घाघरा का बिंब भी स्पष्ट करता था कि यह नदी ही नहीं बल्कि वस्त्र भी है और यह भी कि कहाँ और कैसे पहना जाता है।
उस कविता की पंक्तियाँ हैं- "प्रीतम परदेस से वापस चले आओ/कंचन जंघा का तुम्हें आमंत्रण है।
घाघरा खतरे के निशान के ऊपर है।"
आज मंचीय कविता श्रव्य से अधिक दृश्य हो गई है। विचार से अधिक व्यक्ति केंद्रित हो गई है। सीधे व्यक्तियों पर कविताएँ लिखी जा रही हैं। अधिकांश मंचीय कविताओं की उमर दो-चार साल ही रहती है। किसी - किसी कविता की उमर तो बस दो चार घंटे की ही होती है।कभी- कभी तो ऐसा देखा गाया है कि कवि के मंच से उतरते ही कविता भी उसी के साथ-साथ उतर जाती है। यदि ऐसा न होता तो मेरे घनिष्ठ मित्र और मंचीय कवि स्वर्गीय वाहिद भाई को ही यह लिखने को विवश न होना पड़ता कि, "कविता को कविता रहने दे, कोठे का व्यापार न कर।"
संचालक प्रायः श्लील- अश्लील का भेद भूल जाता है। आज संस्कारी स्त्री मंचीय श्रोता बनने से परहेज करती है। मंचीय कविता से विशेष रूप से हास्य और स्टैंडअप कमेडी का विषय-भेद मिटता जा रहा है। स्टैंडअप कमेडी के शब्द अश्लील होते हैं और इस कविता के बिंब। इसके शब्द ऊपर से भले अश्लील न लगते हों पर बिंब अश्लील ही बनते हैं।
हाल के दिनों में मैंने जो भी कवि सम्मेलन देखे-सुने या उनके सहभागी बनने का सुयोग मिला, उनमें से अधिकांश का स्तर साहित्यक तो नहीं ही कहा जा सकता।
अस्सी के दशक से पहले के मंच काव्य संस्कार जगाते थे लेकिन बाद के मंच धीरे-धीरे साहित्य से विरत होते गए।
इक्कीसवीं सदी में तो केवल हास्य कवि सम्मेलनों का चलन बढ़ा। इस प्रवृत्ति ने तो मंचों की और मिट्टी पलीद कर दी।
एक बात और कि इक्का- दुक्का कवि- कवयित्रियाँ सदैव मूल्यों के पक्षधर के रूप में मिलते रहे हैं। लेकिन उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की-सी रही है। जहाँ तक सरस्वती के मंचीय मंदिर की बात है, मैं उसे मदिरालय के समीप पाता हूँ। इस देहरी पर मत्था टेकने वाले नब्बे प्रतिशत कवि बेवड़े से कम स्तर के मदिरा प्रेमी नहीं होते।यहाँ तक कि पद्मश्री तक को भी मैंने मदिरा से नहाकर इसी सरस्वती- मंदिर (काव्य-मंच) के गर्भगृह में पूजा पर बैठते देखा है।
आज मंचीय कविता के आदर्श है, लिफ़ाफे का वजन।संयोजक की मेजबानी में परोसी गई मदिरा की ब्रांड और तालियाँ । जो जितने अधिक पैसे पाता है, उतना बड़ा कवि। जो जितना पियक्कड़ है, उतना पूज्य।नाम नहीं लेना चाहता लेकिन प्रसंग आ गया है तो बताता चलूँ कि एक शायर अपनी चहेती शायरा के साथ होटल में रूम साझा करना चाहता था। इसके लिए वह कई बार डाँट खाकर भी मुझसे घंटों गिड़गिड़ाता रहा था।कामांधता की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है?
मेरे अभिन्न मित्र श्यामल मजूमदार को एक किस्सा पता है,जब वे मुझसे मज़ाक में कहने लगे कि,"मुझमें क्या कमी है? मुझे ढाका क्यों नहीं बुलाते?श्रलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन (आईएएस) अकादमी के लायक मैं था और यहाँ नालायक हो गया(जब लाल बहादुर राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में था तो उन्हें वहाँ काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया था)। क्या आईएएस से ज़्यादा समझदार स्रोता वहाँ हैं? दादा सोम ठाकुर को भी आपने वहाँ बुलाया था। लेकिन अबकी क्या उन्हें इसलिए छोड़ दिया कि अब वे हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष नहीं हैं।" श्यामल जी मूल्यों की पक्षधरता के साथ हास्य-व्यंग्य लिखते-पढ़ते हैं।इसलिए उनके मज़ाक को भी मैं गंभीरता से सुनता हूँ। इसके बाद मैंने उनसे पूछा, आखिर माज़रा क्या है तो उन्होंने फिर से एक प्रश्न दागा ,"क्या आपने अमुक जोड़ी को ढाका बुलाया है तो मैं दंग रह गया।" बात उन दिनों की है जब भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (विदेश मंत्रालय),नई दिल्ली मुझे ढाका की कल्चरल चेयर पर भेज रहा था। अंततः पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मैं वहाँ जा नहीं पाया और बाद में उसकी जगह चीन गया।
जिस जोड़ी की बात मैं कर रहा हूँ उनके छंद और एकाध गीत (भी) मुझे अच्छे लगते थे और उनकी सहचरी का सुरीला कंठ। इसलिए मैंने उनसे कहा था कि ढाका पहुँचते ही कोई साहित्यिक कार्यक्रम रखना चाहूँगा। वे लोगों से इसका उल्लेख अपनी उपलब्धि के रूप में करने लगे थे। इससे मैं स्तंभित हुआ था। कुछ लोगों का दावा है कि वे अपने पिता के छंद पढ़ते हैं। यह सच है कि यह बात मैं दावे से झुठला नहीं सकता पर है सच। उनके भीतर कुंडली मारे बैठे छलछंद से कुछ असंभव भी नहीं लगता। ऐसे एक नहीं अनेक कवि हैं जिनको यदि अपनी चहेती कवयित्री के बिना किसी मंच पर चढ़ना पड़े तो विधुर भाव से ही चढ़ते हैं।
एक और स्थापित कवि जो कोरोना में गोलोक की यात्रा पर निकल गए हैं, वे भी इन्हीं के जोड़ीदार रहे हैं। एक बार उन्होंने मुझसे खुलकर कहा था कि," उन(सहचरी)को भी बुलाओ। आर्थिक मज़बूरी हो तो मेरे में से काटकर दे दो।"
मैं मंच को तब से जानता हूँ,जब डॉ. सावित्री शर्मा और सुमित्रा कुमारी सिन्हा (उत्तर छायावाद की प्रतिनिधि कवयित्री)यदा-कदा मंच पर भी जाती थीं। एक बार सुमित्रा जी ने मुझसे कहा," सावित्री को मैं ले गई थी।" जबकि मंच के लिहाज़ से डॉ. सावित्री शर्मा उनसे बेहतर थीं। उनके आचरण से मुझे लगा कि मंच की एक और बड़ी खामी है कि वह बिना ज़रूरत के इनसान को बड़बोला बना देता है।
ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। व्यास के बजाय समास में कहने से समय बचता है। सो वही कर रहा हूँ और इसे यहीं विराम देना उचित समझ रहा हूंँ।
आदरणीया डॉ. सरिता शर्मा के बहाने यह सच मुझे कुछ जल्दी उद्घाटित करना पड़ा।एक मछली सारे तालाब को गंदा करने के लिए काफी है।यहाँ तो अनेक हैं। अपने साक्षात्कार में आदरणीया सरिता जी स्त्री और मंचीय कवयित्री होने के नाते जितना कह सकती थीं, उतना उन्होंने कहा और दम से कहा, दंभ से नहीं।
छूँछे बरतन ही ज्यादा छलकते हैं,भरे नहीं। शील और संस्कार से भारतीय स्त्री छूँछी कभी नहीं हुई। आज भी संयम और शील में पुरुष पर केवल मात्रा के बल पर नहीं गुणवत्ता के बल पर भी भारी है। इसीलिए वह गंभीर रहती आई है। सब कुछ तो वह कभी नहीं कहती। कुछ कहती भी है तो बहुत कुछ अपने सहने के लिए भी छोड़ रखती है।
स्त्री जाति के शील स्वभाव वश इन्होंने मंच का कुछ ही सच कहा। शेष तो किसी न किसी पुरुष को ही कहना था। सो उनके हिस्से का भी मैं ही भाख गया।
जो कवि और कवयित्रियाँ यह सच सह न पाएँ गरियाएँ या माफ़ करें, यह मैं उन्हीं पर छोड़ता हूँ।
-डा० गुणशेखर
अपना वही है जो आपके दुःख की आंच से पिघल जाए।
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