GD studio

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24/10/2024

जहाँ हमारा स्वार्थ समाप्त होता है…
वहीं से हमारी इंसानित आरंभ होती है…
यह महत्वपूर्ण नहीं है कि…
कितने बेईमान लोग आपको देखकर ईमानदार बने…
महत्व तो इस बात का है कि…
कितने बेईमान लोगों को देखकर भी …
आप स्वयं ईमानदार बने रहे…
🙏सुप्रभात🙏
महामंडलेश्वर योगी हितेश्वर नाथ

23/09/2024

aage foword jarur kre
एक बार दशहरा बीत चुका था , दीपावली समीप थी , तभी एक दिन कुछ युवक - युवतियों की NGO टाइप टोली एक कॉलेज में आई !

उन्होंने छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे ; किन्तु एक प्रश्न पर कॉलेज में सन्नाटा छा गया !

उन्होंने पूछा , " जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्षो के वनवास से अयोध्या लौटने के उत्साह में मनाई जाती है , तो दीपावली पर " लक्ष्मी पूजन " क्यों होता है ? श्री राम की पूजा क्यों नही ?"

प्रश्न पर सन्नाटा छा गया , क्यों कि उस समय कोई सोशल मीडिया तो था नहीं , स्मार्ट फोन भी नहीं थे ! किसी को कुछ नहीं पता ! तब , सन्नाटा चीरते हुए , हममें से ही एक हाथ , प्रश्न का उत्तर देने हेतु ऊपर उठा !

उसने बताया कि " दीपावली " उत्सव दो युग " सतयुग " और " त्रेता युग " से जुड़ा हुआ है !"

" सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी !" इसलिए " लक्ष्मी पूजन " होता है !

भगवान श्री राम भी त्रेता युग मे इसी दिन अयोध्या लौटे थे ! तो अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था ! इसलिए इसका नाम दीपावली है !

इसलिए इस पर्व के दो नाम हैं , " लक्ष्मी पूजन " जो सतयुग से जुड़ा है , और दूजा " दीपावली " जो त्रेता युग , प्रभु श्री राम और दीपो से जुड़ा है !

हमारे उत्तर के बाद थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा , क्यों कि किसी को भी उत्तर नहीं पता था ! यहां तक कि प्रश्न पूछ रही टोली को भी नहीं !
बाद में पता चला , कि वो टोली आज की शब्दावली अनुसार " लिबरर्ल्स " ( वामपंथियों ) की थी , जो हर कॉलेज में जाकर युवाओं के मस्तिष्क में यह बात डाल रही थी , कि " लक्ष्मी पूजन " का औचित्य क्या है , जब दीपावली श्री राम से जुड़ी है ?" कुल मिलाकर वह छात्रों का ब्रेनवॉश कर रही थी !

लेकिन हमारे उत्तर के बाद , वह टोली गायब हो गई !

एक और प्रश्न भी था , कि लक्ष्मी और श्री गणेश का आपस में क्या रिश्ता है ?

और दीपावली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है ?

सही उत्तर है :

लक्ष्मी जी जब सागर मन्थन में मिलीं , और भगवान विष्णु से विवाह किया , तो उन्हें धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया, उन्होंने धन को बाँटने के लिए मैनेजर कुबेर को बनाया !
कुबेर कुछ कंजूस वृति के थे ! वे धन बाँटते नहीं थे , स्वयं धन के भंडारी बन कर बैठ गए !

माता लक्ष्मी परेशान हो गई ! उनकी सन्तान को कृपा नहीं मिल रही थी !

उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई ! भगवान विष्णु ने उन्हें कहा , कि " तुम मैनेजर बदल लो !"

माँ लक्ष्मी बोली : " यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं ! उन्हें बुरा लगेगा !"

तब भगवान विष्णु ने उन्हें श्री गणेश जी की दीर्घ और विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी !

माँ लक्ष्मी ने श्री गणेश जी को " धन का डिस्ट्रीब्यूटर " बनने को कहा !

श्री गणेश जी ठहरे महा बुद्धिमान, वे बोले : " माँ, मैं जिसका भी नाम बताऊंगा , उस पर आप कृपा कर देना ! कोई किंतु , परन्तु नहीं !" माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी !

अब श्री गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न / रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे !

कुबेर भंडारी ही बनकर रह गए ! श्री गणेश जी पैसा प्रदान करने वाले बन गए !

गणेश जी की दरियादिली देख , माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्री गणेश को आशीर्वाद दिया , कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों , वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें !

दीपावली आती है कार्तिक अमावस्या को ! भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं ! वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद , देव उठावनी एकादशी को !

माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है , शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में , तो वे सँग ले आती हैं श्री गणेश जी को ! इसलिए दीपावली को लक्ष्मी - गणेश की पूजा होती है !
🙏🌹🙏
( यह कैसी विडंबना है , कि देश और हिंदुओ के सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नहीं है ? औऱ जो वर्णन है , वह अधूरा है !)

इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों , अपनी अगली पीढी को बतायें और दूसरों के साथ साझा करना ना भूलें !🌹🚩🙏🕉️🙏🚩🌹

Photos from GD studio's post 05/06/2024

पर्यावरण प्रेमी ही पूरा पढ़े विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और बहुत से लोग सोसल मीडिया पर पौधे लगाते हैं और शेयर भी करते है में वेद्य हंसराज स्वामी मेरा मानना कुछ अलग है पोस्ट को पूरा पढ़ना जी 🖍️मैनें पेड़ से फोन कर के पूछा कैसे हो, कहाँ रहते हो, आजकल दिखाई नहीं देते⁉️

पेड़ बोला मात्र चालिस साल पहले तक हम बहुत सारे नीम, पीपल, बड़, कीकर, शीशम, जांडी, आम, जामुन, जाळ, शहतूत व लेसुवे आदि आपके आसपास ही रहते थे।

याद करो तब तक आपके घरों में फर्नीचर के नाम पर खाट, पीढे व मूढ़े ही होते थे। खाट व पीढे के सिर्फ पावे हमारी लकड़ी से बनते थे। सेरू व बाही बाँस की ही होती थी, मूढ़े सरकंडे से बने होते थे।

फिर आप लोगों को पता नहीं क्या हुआ आपने हमें उखाड़ बाढना काटना शुरू कर दिया। हमारी लकड़ी से डबल बैड, सोफे, मेज, अलमारी व कुर्सी आदि बना कर अपने घरों में भर ली। आप स्कूलों में टाट बिछाकर पढ़ा करते थे फिर हमें काट कर बैंच बना डाले। नजर घुमाओ और देखो कोई तीस चालिस साल पुराणा पेड़ आसपास है के‼️‼️

हम पेड़ आजकल आपके घर, दफ्तर व स्कूल कालेजों में ही हैं।

मैनें फिर पेड़ से पूछा कि आज तो विश्व पर्यावरण दिवस है चलो एक पेड़ मैं लगा देता हूँ।

पेड़ भड़क गया और कहा कि जन्मजात मुर्ख हो या पढ़लिख कर हो गये, लगता है हमारी लाश से बणे सोफे या डबल बैड पर बैठकर, ऐ•सी• चलाकर, सोशल मीडिया से प्रभावित हो कर फोन कर रहे हो। बाहर निकल कर देखो इस 48℃ के तापमान में हमारी वृद्धि कैसे होगी। अरे वो पश्चिमी जगत वाले अपने मौसम व मान्यताओं के हिसाब से दिन निर्धारित करते हैं और तुम अक्ल से अंधे भारतीय आँख मिंच कर उन्हें मानने लगते हो।😡😡

पेड़ एक नहीं अनेक लगाना पर मानसून आने पर। जेठ के महीने में पेड़ लगायेगा आड़ू, पाणी तेरा बाप देगा। अषाढ़ से फागुन तक जितने मर्जी लगा लेना😠😠

फिर पेड़ गाणा गाणे लगा "तेरी दुनिया से दूर, चले हो के मजबूर, हमें याद रखना

11/01/2024

श्री टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। अपनी पत्नी के साथ यूपी की यात्रा पर जाते समय उनकी पत्नी ने सड़क किनारे एक पेड़ पर बया (एक प्रकार की चिड़िया)का घोंसला देखा और कहा,
”यह घोंसला मुझे ला दो; मैं घर को सजाकर रखना चाहतीं हूँ।”

श्री टी एन शेषन ने साथ चल रहे सुरक्षा गार्ड से इस घोंसले को नीचे उतारने को कहा। सुरक्षा गार्ड ने पास ही भेड़-बकरियां चरा रहे एक अनपढ़ लड़के से कहा कि अगर तुम यह घोंसला निकाल दोगे तो मैं तुम्हें बदले में दस रुपये दूंगा।

लेकिन लड़के ने मना कर दिया। श्री शेषन स्वयं गये और लड़के को पचास रुपये देने की पेशकश की, लेकिन लड़के ने घोंसला लाने से इनकार कर दिया और कहा कि

अच्छा लगे तो शेयर कर दे

"सर,इस घोंसले में चिडिया के बच्चे हैं। शाम को जब उस बच्चे की "माँ" खाना लेकर आएगी तो वह बहुत उदास होगी, इसलिए तुम कितना भी पैसा दे दो, मैं घोंसला नहीं उतारूंगा"

इस घटना के बारे में श्री टी.एन. शेषन लिखते हैं कि....

मुझे जीवन भर इस बात का अफ़सोस रहा कि एक पढ़े-लिखे आईएएस में वो विचार और भावनाएँ क्यों नहीं आईं जो एक अनपढ़ लड़का सोचता था?

उन्होंने आगे लिखा कि-
मेरी तमाम डिग्री,आईएएस का पद, प्रतिष्ठा, पैसा सब उस अनपढ़ बच्चे के सामने मिट्टी में मिल गया।

जीवन तभी आनंददायक बनता है जब बुद्धि और धन के साथ संवेदनशीलता भी हो।
🙏🙏 🙏🙏

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