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03/06/2026

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03/06/2026

उपनल, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग तेज, सरकार से शीघ्र निर्णय लेने की अपील
देहरादून। उत्तराखंड में विभिन्न निगमों, नगर निकायों, पंचायतों और स्वायत्तशासी संस्थाओं में वर्षों से कार्यरत उपनल, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के नियमितीकरण का मुद्दा एक बार फिर प्रमुखता से उठाया गया है। राज्य निगम कर्मचारी अधिकारी महासंघ ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को ज्ञापन सौंपकर इन कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने तथा लंबित मांगों के शीघ्र समाधान की मांग की है।
महासंघ का कहना है कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर समय-समय पर निर्णय लिए गए हैं, लेकिन निगमों, निकायों और स्वायत्तशासी संस्थाओं में सेवा दे रहे हजारों कर्मचारी आज भी नियमितीकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लंबे समय से सेवाएं देने के बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान सेवा सुरक्षा, पदोन्नति और अन्य सुविधाएं प्राप्त नहीं हो पा रही हैं। इससे कर्मचारियों में निराशा और असंतोष का माहौल बन रहा है।
संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि उपनल, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी वर्षों से सरकारी संस्थाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अनेक कर्मचारी ऐसे हैं जिन्होंने एक दशक से अधिक समय तक लगातार सेवाएं दी हैं, लेकिन आज भी उनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। कर्मचारियों को हर समय नौकरी जाने की चिंता बनी रहती है, जिससे उनके परिवारों पर भी मानसिक और आर्थिक दबाव पड़ता है।
महासंघ ने सरकार से मांग की है कि इन कर्मचारियों के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी नियमितीकरण नीति बनाई जाए तथा उस पर समयबद्ध तरीके से अमल किया जाए। संगठन का मानना है कि नियमितीकरण से न केवल कर्मचारियों को स्थायित्व मिलेगा, बल्कि सरकारी संस्थाओं में कार्यकुशलता और जवाबदेही भी बढ़ेगी। कर्मचारियों को यह विश्वास मिलेगा कि उनकी वर्षों की मेहनत और सेवाओं का उचित सम्मान किया जा रहा है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि निगमों और अन्य संस्थाओं में पदोन्नति से संबंधित कई मामले लंबे समय से लंबित हैं। पदोन्नति में आवश्यक शिथिलीकरण नहीं होने के कारण कर्मचारियों के कैरियर विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके अलावा महंगाई भत्ता तथा अन्य वित्तीय लाभों से जुड़े कई मुद्दे भी वर्षों से लंबित हैं, जिनका समाधान अभी तक नहीं हो पाया है।
महासंघ ने सरकार का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि विभिन्न निगमों और संस्थाओं में लगभग नौ हजार पद रिक्त पड़े हुए हैं। इन रिक्त पदों को नहीं भरे जाने के कारण मौजूदा कर्मचारियों पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ता जा रहा है। कई स्थानों पर सीमित कर्मचारियों के सहारे संस्थानों का संचालन किया जा रहा है, जिससे कार्य की गुणवत्ता और जनसेवाओं पर भी असर पड़ रहा है। संगठन ने मांग की कि रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती प्रक्रिया शुरू कर कर्मचारियों की कमी को दूर किया जाए।
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि नियमितीकरण केवल नौकरी को स्थायी करने का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन और भविष्य की स्थिरता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक पहल करती है तो हजारों कर्मचारियों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। साथ ही सरकारी संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा और वे अधिक समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकेंगे।
महासंघ ने उम्मीद जताई है कि राज्य सरकार कर्मचारियों की भावनाओं और उनकी वर्षों की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए जल्द ही सकारात्मक निर्णय लेगी। अब प्रदेशभर के उपनल, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों की निगाहें सरकार की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह फैसला हजारों परिवारों के भविष्य को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है।
#उपनल

03/06/2026

🚨 "सालों की सेवा का सम्मान, पेंशन पर सबका अधिकार!"
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी से अस्थायी कर्मचारियों को मिली नई उम्मीद
नई दिल्ली | 03 जून 2026
देशभर में कार्यरत लाखों दैनिक वेतनभोगी, संविदा, आउटसोर्स और अस्थायी कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को केवल इसलिए पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी नियुक्ति नियमित श्रेणी में नहीं थी।
अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने लंबे समय तक सरकारी विभाग या संस्था में निरंतर सेवाएं दी हैं, तो उसकी सेवा को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं होगा। न्यायालय ने दोहराया कि पेंशन कर्मचारी के जीवनभर के परिश्रम और सेवा का प्रतिफल है, न कि सरकार द्वारा दी जाने वाली कोई कृपा या अनुग्रह राशि।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने उन लाखों कर्मचारियों की उम्मीदों को बल दिया है जो वर्षों से विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं लेकिन नियमितीकरण या पेंशन लाभ से वंचित हैं। कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में पेंशन संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है और लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को न्याय दिलाने में मदद करेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि कर्मचारी की वर्षों की मेहनत और योगदान को केवल नियुक्ति की तकनीकी स्थिति के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या वर्षों तक सेवा देने वाले संविदा, आउटसोर्स और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को भी पेंशन का लाभ मिलना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं। 🇮🇳

03/06/2026

पूर्व में की गयी दैनिक सेवाओ को भी जोड़ने पर कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

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