KC Sir

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E-201,Mahindra Splendour, Bhandup (west),LBS Marg, Mumbai, Maharashtra

26/09/2025

ग्यारह वर्ष सदा बहार।

25/09/2025

Celebrating my 11th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

14/01/2023

सोने चाँदी के थोक व्यापारियों हेतु
सूचना

सोने चाँदी के थोक व्यापारी जो अपनी दुकान (गद्दी) चौक (गोल-दरवाजा) बाजार या, उसके 100 मीटर के अन्दर बनाना चाहते हैं, उनके लिये,

एक सुनहरा अवसर

आपको 1000 sq.feet की जगह (व्यापारिक संस्थान - commercial Building) के बाजार मूल्य से एक चौथाई दाम में साई हालमार्क की दुकान के पास में उपलब्ध है। जगह के साथ में मॉडर्न बाथरूम और किचन भी उपलब्ध है।
इच्छुक व्यक्ति संपर्क करें।
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0522 4000525

25/01/2022

*क्या आजकल नींव ही कमजोर पड़ रही है, गृहस्थी की!*

*आज हर दिन किसी न किसी का घर खराब हो रहा है।*
इसके मूल कारण और जड़ पर कोई नहीं जा रहा है,जो कि अतिआवश्यक और सम्भावित है,एवं निम्न हैं।
*1-पीहरवालों की अनावश्यक दखलंदाज़ी*
2-संस्कार विहीन शिक्षा
*3-आपसी तालमेल का अभाव*
4-ज़ुबानदराज़ी
*5-सहनशक्ति की कमी*
6-आधुनिकता का आडम्बर
*7-समाज का भय न होना*
8-घमंड झूठे और अधकचरे ज्ञान का
*9-अपनों से अधिक गैरों की राय*
10-परिवार से कटना
*11-घण्टों मोबाइल पर चिपके रहना,और घर गृहस्थी की तरफ ध्यान न देना*
12-मानसिक-अहंकार के वशीभूत होना।
उपर्युक्त 12 कारण तो प्रमुख हैं,बाकी सारे कारण इन बातों से ही उत्पन्न होते हैं।जिन्हें समझना अत्यंत आवश्यक है।
*पहले भी तो परिवार होता था,और वो भी बड़ा।*
लेकिन वर्षों आपस में निभती थी!
*भय था,प्रेम था,और रिश्तों की मर्यादित जवाबदेही भी* रामायण में एक जगह प्रभु राम खुद कहते हैं कि,"भय बिन होय न प्रीति"
पहले माँ बाप ये कहते थे,कि मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष है
*और अब कहते हैं कि मेरी बेटी नाज़ों से पली है।आज तक हमने तिनका भी नहीं उठवाया*
तो फिर करेगी क्या शादी के बाद?और कर भी कैसे पायेगी, जब कुछ करना सीखा ही नहीं।
*शिक्षा के घमँड में बेटी को बड़ों का आदर करना नहीं सिखाना,अच्छी बातें, घर के कामकाज,रसोई के कार्य नहीं सिखाना और बच्चों की परवरिश एवम परिवार चलाने के सँस्कार नहीं देना प्रमुख कारण हैं।
माँएं खुद की रसोई से ज्यादा बेटी के घर में क्या बना ,क्या किया,कहाँ घूमने गयीं आदि पर ध्यान देती हैं।
*भले ही खुद के घर में रसोई में सब्जी जल रही है*
मोबाईल तो है ही रात दिन बात करने के लिए
*परिवार के लिये किसी के पास समय नहीं*
या तो TV या फिर पड़ोसन से एक दूसरे की बुराई या फिर दूसरे के घरों में तांक-झांक
*बुज़ुर्गों को तो बोझ समझते हैं*,बुजुर्गों से राय मशवरा करना,और उनके तजुर्बे से सीख लेकर काम करना और उसका फायदा उठाकर अपना समय और संसाधनों की बचत करना तो आज की पीढ़ी सीखना नहीं चाहती,अगर एक कुछ समझना चाहता है,तो दूसरा उसको करने नहीं देता,और वो मन मारकर कलह न हो यह सोचकर चुप रह जाता है,जिससे साथी को और सह मिलती है।
पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन तक नहीं कर सकता
*सब अपने कमरे में*
वो भी मोबाईल पर
*बड़े घरों का हाल तो और भी खराब है*
कुत्ते बिल्ली के लिये समय है,अपने बच्चों को कुछ सिखाने और अच्छे संस्कार देने का समय या इच्छा नहीं।
*परिवार के लिये भी समय नहीं*
सबसे ज्यादा बदलाव तो इन दिनों महिलाओं में आया है
*दिन भर मनोरँजन*
मोबाईल
*स्कूटी कार पर घूमना फिरना*
समय बचे तो बाज़ार जाकर शॉपिंग करना
*और ब्यूटी पार्लर*
जहां घंटों लाईन भले ही लगानी पड़े
*भोजन बनाने या परिवार के लिये समय नहीं,क्योंकि रोज रोज नये रेस्टोरेंट खुल रहे हैं और उनको चलाने की जिम्मेदारी भी तो है।
खासकर बच्चों को तौर तरीके सिखाना एवम उनके ऊपर ध्यान देना,उनको संस्कार देना तो आज की पीढ़ी जानती ही नहीं है।बच्चों को आत्मनिर्भरता या आत्मविश्वास की सीख देने के बहाने बच्चों में जो अति-विश्वास और गरूर भरा जा रहा है,जो आगे चलकर उनके जीवन को गर्त में ले जाने का कार्य करता है।जब वो अपनी नाकामी की वजह से किसी कार्य में सफल नहीं होते तो वो उसे सह नहीं पाते और टूट जाते हैं,क्योंकि उन्हें" धैर्य और सन्तोष" क्या होता है,ये तो सिखाया ही नहीं जा रहा है।अगर बच्चों को ऎसे ही शिक्षा दी जाती रही तो आगे आने वाली पीढ़ी का भगवान ही मालिक होगा,क्योंकि वो अवसाद (डिप्रेशन) के शिकार होने लगेंगें,और ऎसा होना शुरू भी हो चुका है।
होटल रोज़ नये-नये खुल रहे हैं
*जिसमें स्वाद के नाम पर कचरा बिक रहा है*
और साथ ही बिक रही है,बीमारी एवं फैल रही है,घर में अशांति
*आधुनिकता तो होटलबाज़ी में है*
बुज़ुर्ग तो हैं ही घर में बतौर चौकीदार या बहुत जगह अब साथ में रहते ही नहीं हैं।
*माँ बाप बच्ची को शिक्षा तो बहुत दे रहे हैं*
लेकिन उस शिक्षा के पीछे की सोच?
*ये सोच नहीं है कि परिवार को शिक्षित करेंगी,सुसंस्कृत करेगी,
बल्कि दिमाग में ये है,कि कहीं तलाक-वलाक हो जाये तो अपने पाँव पर खड़ी हो जाये
*ख़ुद कमा खा ले*
जब ऐसी अनिष्ट सोच और आशंका पहले ही दिमाग में हो तो रिज़ल्ट तो वही सामने आना ही है
*साइँस ये कहता है,कि गर्भवती महिला अगर कमरे में सुन्दर शिशु की तस्वीर टांग ले तो शिशु भी सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट होगा*
मतलब हमारी सोच का रिश्ता भविष्य से है
*बस यही सोच कि-अकेले भी जिंदगी जी लेगी गलत है*
संतान सभी को प्रिय है
*लेकिन ऐसे लाड़ प्यार में हम उसका जीवन खराब कर रहे हैं*
पहले पुराने समय में स्त्री तो छोड़ो पुरुष भी थाने,कोर्ट कचहरी जाने से घबराते थे
*और शर्म भी करते थे*
लेकिन अब तो फैशन हो गया है
*पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ तलाकनामा तो जेब में लेकर घूमते हैं*
पहले समाज के चार लोगों की राय मानी जाती थी
*और अब तो समाज की कौन कहे,माँ बाप तक को जूते की नोंक पर रखते हैं*
सबसे खतरनाक है-ज़ुबान और भाषा,जिस पर अब कोई नियंत्रण नहीं रखना चाहता
*कभी-कभी न चाहते हुए भी चुप रहकर घर को बिगड़ने से बचाया जा सकता है*
लेकिन चुप रहना कमज़ोरी समझा जाता है।आखिर शिक्षित जो हैं,और उसपर मायके की सह,सोने पर सुहागे का काम करती है,
*और हम किसी से कम नहीं वाली सोच जो विरासत में मिली है,चाहें खुद कुछ भी करने की स्थिति में न हों पर दिमाग सातवें आसमान पर ही रहता है कि बहुत कुछ कर सकते हैं।
गोली से बड़ा घाव बोली का होता है
*आज समाज,सरकार व सभी चैनल केवल महिलाओं के हित की बात करते हैं*
पुरुष जैसे अत्याचारी और नरभक्षी हों
*बेटा भी तो पुरुष ही है*
एक अच्छा पति भी तो पुरुष ही है
*जो खुद सुबह से शाम तक दौड़ता है,परिवार की खुशहाली के लिये*
खुद के पास भले ही पहनने के कपड़े न हों
*घरवाली के लिये हार के सपने ज़रूर देखता है*
बच्चों को महँगी शिक्षा देता है और उनकी खुशी के सारे साधन जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ता है।
*मैं मानता हूँ पहले नारी अबला थी*
माँ बाप से एक चिठ्ठी को मोहताज़
*और बड़े परिवार के काम का बोझ*
अब ऐसा है क्या?
*सारी आज़ादी*
मनोरंजन हेतु TV
*कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन*
मसाला पीसने के लिए मिक्सी ,चार बर्नर वाला गैस का चूल्हा,ओटीजी,और ओवन,बर्तन धोने के लिये डिश-वॉशर और जाने क्या क्या चीजें घरों में होती हैं,
*रेडिमेड पैक्ड आटा*
पैसे हैं,तो नौकर-चाकर
*घूमने को स्कूटी या कार*
फिर भी और आज़ादी चाहिये
*आखिर ये मृगतृष्णा का अंत कब और कैसे होगा?*
घर में कोई काम ही नहीं बचा
*दो लोगों का परिवार*
उस पर भी ताना
*कि रात दिन काम कर रही हूं*
ब्यूटी पार्लर आधे घंटे जाना आधे घंटे आना और एक घंटे सजना नहीं अखरता।
*लेकिन दो रोटी बनाना अखर जाता है*
कोई कुछ बोला तो क्यों बोला?
*बस यही सब वजह है घर बिगड़ने की*
खुद की जगह घर को सजाने सवारने,और बच्चों को संस्कारी बनाने में ध्यान दें,तो ये सब न हो
*समय होकर भी समय कम है परिवार के लिये*
ऐसे में परिवार तो टूटेंगे ही,और बच्चे बिगड़ेंगें ही।
*पहले की हवेलियां सैकड़ों बरसों से खड़ी हैं,और पुराने रिश्ते भी*
आज के घर कुछ दिनों में ही धराशायी
*और रिश्ते भी महीनों में खत्म*
इसका कारण है,रिश्तों मे ग़लत सँस्कार और खुदगर्जी की सोच,खैर हम तो जी लिये
*सोचे आनेवाली पीढी*
घर चाहिये या दिखावे की आज़ादी?
*दिनभर बाहर घूमने के बाद रात तो घर में ही महफूज़ होती है*
आप मानो या ना मानो आप की मर्जी मगर यह सत्य है,कि अगर अब भी नहीं सुधरने की सोची तो शायद बहुत देर हो जायेगी। 🙏🏼🙏🏼 धन्यवाद,
KC Sir
इस लेख का कुछ भाग हमने किसी लेख से लिया है,एवम कुछ भाग हमने खुद लिखा है।
इसमें व्यक्त विचारों से 2-4% व्यक्ति अपवाद के रूप में हो सकते हैं।
आप लोगों की टिप्पणियों का स्वागत है।

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