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13/07/2026

📖 इस्लाम के सिद्धांत आतंकवाद के विरुद्ध हैं, आइये समझते हैं। 👇
اللّٰه تعالیٰ فرماتا ہے:
﴿مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا ۖ وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا﴾
(सूरह अल-माइदा 5:32)
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"इसी कारण हमने बनी इस्राईल पर यह हुक्म लिख दिया था कि जो कोई किसी व्यक्ति को, किसी के बदले के बिना या धरती में फ़साद फैलाने के अलावा, क़त्ल कर दे तो मानो उसने सारे इंसानों को क़त्ल कर दिया। और जिसने किसी एक की जान बचाई, उसने मानो सारे इंसानों की जान बचाई।"

﴿وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ﴾
(सूरह अल-बक़रह 2:190)

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"ज़्यादती मत करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।"
﴿لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ﴾
(सूरह अल-मुम्तहिना 60:8)

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"अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ भलाई और न्याय करने से नहीं रोकता जिन्होंने धर्म के कारण तुमसे युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है।"
﴿لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ﴾
(सूरह अल-काफ़िरून 109:6)

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"तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म।"

#संदेश
इस्लाम निर्दोषों की हत्या, अन्याय और आतंकवाद का समर्थन नहीं करता, बल्कि न्याय, दया और मानव जीवन की पवित्रता पर ज़ोर देता है। क़ुरआन यह भी सिखाता है कि जो लोग मुसलमानों से युद्ध नहीं करते, उनके साथ भलाई और इंसाफ़ किया जाए। साथ ही, "तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा धर्म" कहकर दूसरों के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करने का सिद्धांत भी प्रस्तुत करता है।

"आतंकवाद किसी भी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करता; किसी व्यक्ति या संगठन के अपराधों को पूरे धर्म की शिक्षा नहीं माना जा सकता।"

#नोट : अगर #हिन्दू_धर्म या किसी धर्म का मानने कोई व्यक्ति कोई अपराध मतलब जैसे बलात्कार करता है तो उसकी सज़ा का ज़िम्मेदार उसका धर्म तब होगा जब उसके धार्मिक सिद्धांत में उस अपराध के लिए मना ना किया गया हो इसलिए किसी धर्म को टारगेट करना गलत है।
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11/07/2026

#गाजियाबाद_से_एक_और_दिल_दहला_देने_वाली_घटना सामने आई है, सवाल ये है कि उत्तर प्रदेश में रोज़ हो रहे बलात्कार को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी है⁉️

रोज़ाना सत्ता में बैठे लोगो के प्रवक्ता कहते नहीं थकते कि पिछली सरकारें खूनी थी तो क्या अगर ऐसा था भी तो आप भी खून करोगे बलात्कार हत्या होते देखोगे ⁉️

ख़बर ये है कि गाजियाबाद में शुक्रवार को 7 साल की बच्ची के साथ गैंगरे*प के बाद उसकी ह*त्या कर दी गई! देर रात करीब 1 बजे उसकी लाश एक निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट में अर्धनग्न और खून से लथपथ हालत में मिला! बच्ची का सिर कुचला हुआ था, जबकि गले पर भी चोट के निशान थे।

पुलिस ने बेसमेंट में तलाश की, जहां बच्ची का शव बरामद हुआ! उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे! बच्ची की मां ने बताया, मेरी बेटी 7 साल की थी! रात में उसकी लाश मिली!
जब श*व मिला,तब उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे उसके साथ तीन लोगों ने गलत काम किया।

महिलाओ के खिलाफ़ अत्त्याचार पर आवाज़ उठाइये बेटी किसी की हो सम्मानित होती है। 🙏
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10/07/2026

#अन्याय_और_अत्याचार_के_ख़िलाफ़_पैग़म्बर_मुहम्मद_ﷺ_का_संदेश

इस्लाम में ज़ुल्म (अन्याय और अत्याचार) की कोई जगह नहीं है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने हर इंसान के साथ चाहे वो कोई भी हो इस्लाम का मानने वाला हो या ना हो उसके साथ न्याय करने, असहाय मज़लूम तबको की मदद करने और ज़ालिम (अत्त्याचारी) को उसके अत्त्याचार से रोकने की शिक्षा दी है।

1. अल्लाह न्याय का आदेश देता है
"निस्संदेह अल्लाह न्याय, भलाई और रिश्तेदारों को उनका हक़ देने का आदेश देता है तथा अश्लीलता, बुराई और ज़ुल्म से रोकता है।"
क़ुरआन, सूरह अन-नहल (16:90)

2. ज़ुल्म से बचने की चेतावनी
"ज़ुल्म से बचो, क्योंकि क़ियामत के दिन ज़ुल्म अंधेरों का कारण होगा।"
सहीह मुस्लिम, हदीस 2578

3. ज़ालिम को रोकना भी उसकी मदद है
"अपने भाई की मदद करो, चाहे वह ज़ालिम अत्त्याचारी हो या मज़लूम।"
सहाबा ने पूछा: "ज़ालिम की मदद कैसे करें⁉️"
नबी ﷺ ने फ़रमाया: "उसे ज़ुल्म करने से रोक दो, यही उसकी मदद है।" सहीह बुख़ारी, हदीस 2444

4. सत्य और न्याय के लिए आवाज़ उठाना
"सबसे श्रेष्ठ जिहाद अत्याचारी शासक के सामने सत्य बात कहना है।"
सुनन अबू दाऊद 4344, सुनन तिर्मिज़ी 2174

5. निर्दोष की हत्या का कठोर निषेध
"जिसने किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, मानो उसने पूरी मानवता की हत्या की।"
क़ुरआन, सूरह अल-माइदा (5:32)

#निष्कर्ष
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का संदेश स्पष्ट था:
किसी पर ज़ुल्म मत करो।
मज़लूम (पीड़ित) का साथ दो।
ज़ालिम को उसके ज़ुल्म से रोको।
हर हाल में न्याय और सत्य का साथ दो।
किसी भी निर्दोष का अधिकार मत छीनो और उसकी जान की हिफ़ाज़त करो।
इस्लाम का सिद्धांत है: "न्याय हर व्यक्ति के लिए है, और ज़ुल्म किसी के साथ भी स्वीकार नहीं है।"
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