Manoj Manav

Manoj Manav

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10/07/2026

इंसानों की क़ीमत इतनी गिरा दी,
ज़िंदगी की मंज़िल गेहूँ-चावल बना दी।

जिसे सोच की ऊँचाइयाँ छूनी थीं एक दिन,
उसने राशन की कतारों में उम्र बिता दी।

ज़िंदा थे कभी रिश्ते, उसूल और मोहब्बत,
बाज़ार ने हर चीज़ की बोली लगा दी।

जो मुल्क सितारों से आगे निकल सकता था,
उसकी सारी बहसें मंदिर-मस्जिद बना दीं।

✍️ Manoj Manav की कलम से...

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