The Programmer Girlfriend
18/05/2026
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adolescence
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"कितने दिन हो गए हम पार्क नहीं गए!! मैं आपके साथ पार्क जाने आया हूँ। थोड़ा खेलने, घूमने? मम्मी कहती है, किसी को चोट लगी हो तो पहले हाल पूछना चाहिए, अब आप कैसी हो?",
एक "बचपना" ही ऐसी स्थिति है जहाँ ऐसी paradoxical माँग पूरी हो सके। Puss in the Boots जैसी उसकी बड़ी बड़ी, भोली आँखें, उसकी प्यारी ज़िद,उसकी cheek to cheek मुस्कान.... इनके आगे मैं हमेशा हार जाती थी। लेकिन आज मैं उसकी बात नहीं मान सकती थी।
"हाँ, यहाँ बहुत दर्द है", मैने हाथ पर लगे प्लास्टर की ओर इशारा किया, "i am so sorry, आज नहीं आ सकूँगी।"
"पार्क तो सामने ही है, और चलना पैरों से है। चलो न, प्लीज़", वह ज़िद करने लगा, "पता है, जबसे आपको चोट लगी तबसे मैं कहीं पार्क नहीं गया।"
हाँ, प्लास्टर चढ़ कर कुछ दिन हो तो गए थे, मगर फिलहाल तबीयत नहीं थी के पार्क में सैर की जाय।
दर्द उठता था, ख़ून बह जाने से कमज़ोरी थी, कभी हल्का बुखार रहता।
मगर यह बातें इसकी समझ नहीं आएंगी यह जानती थी, सो चुप रही। उसे मुस्कुरा कर देखती रही।
वह पलंग पर बैठा, अपने पैर झुलाते हुए, मेरे प्लास्टर को घूर रहा था। बच्चों में... दोस्त के प्लास्टर पर मार्कर पेन से लिखने का फ़ैशन है, वह उठा और काले मार्कर से प्लास्टर पर "गेट वेल सून, लव यू" लिखकर कुछ सितारे draw कर दिए।
मैं अब भी शांत, चुपचाप, उसकी शैतानियां देख रही थी। मुस्कुराते हुए उसकी drawing निहार रही थी।
मेरी चुप्पी को उसने "हाँ" समझ लिया।
हमेशा की तरह।
कुछ सेकंड्स कमरे में इधर उधर देखता रहा। पार्क जाने की इच्छा की तीव्रता अब उसकी आँखों में, उसकी अधीरता में झाँक रही थी।
वह इतना बेचैन था, इतना उत्सुक था, कि बड़ी चोट लगने पर बच्चे और बड़े, दोनों ही पार्क-वार्क नहीं जाते, या सामान्य सी बात समझते हुए भी, उस बात को नज़रंदाज़ कर रहा था।
धीरज खो कर वह अचानक मेरी ओर आया, और
"चलो न!" की ज़िद करते हुए मुझे खींचने, अपने हाथ मेरी प्लास्टर लगी बांह की तरफ उठाए।
झट से मैंने दूसरे हाथ से उसे, दूर ही रोका।
"अरे क्या कर रहे हो? इस हाथ को नहीं छूना। इसमें ज़ख्म है, प्लास्टर है, दर्द भी हो रहा है।", मैने समझाने की कोशिश की,
"देखो मुझे बुखार भी है। मुझे heal होने दो फिर आऊंगी, ओके? आज नहीं, प्लीज़? ... Umm, तुम मुझे जल्दी से heal होने में मदद क्यों नहीं करते ..?"
उसने हाथ उठाकर हैरी पॉटर की नक़ल उतारते हुए कहा .. "Abra ca dabra ... Gili Gili... छू:! अब आप ठीक हो गई।"
"Hahaha.. सो स्वीट. काश healing इतनी आसान होती!" मैने कहा
उसने मासूमियत से पूछा ..."अच्छा, इससे दर्द heal नहीं हुआ? I am ready to help. बताओ मैं क्या करूं, खुद को कैसे train करूं, ताकि आप जल्दी से ठीक हो जाओ, so you can take me to the park.."
" ओह, तुम मेरी healing सिर्फ़ अपने पार्क के लिए चाहते हो?"
"Why else? आपको भी पार्क जाना अच्छा लगता है। दोनों का फायदा!
Otherwise, मैं नहीं आता तो आप अपने आप भी heal हो जाएंगी न"
उसका एक उद्देश्य था और साफ़ था।
मैं ही ...एक पार्क की सैर के " मज़े" के लिए दर्द, ज़ख्म, जिंदगी दांव पर लगाने वाली बेवकूफ़ थी!
पिछले हफ़्ते इस के साथ पार्क से निकलते हुए हादसा हुआ था, गिर गई और हाथ की हड्डी टूट गई थी।
मन में हल्का ट्रॉमा भी था, ठीक होती तो भी शायद पार्क नहीं जा पाती। उसने कहा,
"अरे...आप गिरे थे न, दर्द तो आपको है न। मुझे तो नहीं। मुझे तो पार्क ले चलो??"
उसकी बातें सुनकर मैं चौंक गई और सोचने लगी।
उसके हिसाब से, उसे पार्क ले जाना मेरा... कर्तव्य था?
सुख दुख भूलकर निभाई जाने वाली मेरी ड्यूटी थी?
शायद एक माँ से यह उम्मीद की भी जाय, . लेकिन, मैं उसकी माँ नहीं।
उसकी क्या मनःस्थिति होगी, यह साइकोलॉजी कैसे बन गई होगी कि सभी लोगों से एक जैसी उम्मीद की जा रही है?
has he been pampered so much?
न, यह उसका स्वार्थ नहीं बोल रहा था - क्या इसे स्वार्थ कह सकते हैं?
उसके बालमन ने अनुभवों से यही माना था कि दुनिया उसके लिए है, उसके इर्द गिर्द घूमती है।
और .. हम सभी लोग सिर्फ़ उसकी जरूरतें पूरी करने के लिए exist करते हैं।
Sighhh.
बचपने के मन के दायरे कितने सीमित होते हैं न?
Life is so simple in ignorance.
2+2 is easily, and, always = 4 for a naive mind!
विचारों की रील्स की doom scrolling उसकी आवाज़ से टूटी।
मेरी चुप्पी को आदतन उसने इक़रार मान लिया।
"चलो चलो।" उसने फिर कहा।
मैं चुपचाप उसे देखती रही।
"क्यों नहीं चल रही?", उसे ज़ख्म की संजीदगी,.. दर्द... हीलिंग ...समझ ही नहीं आ रहा था।
न इनकार समझ आ रहा था ...ना verbal, ना silent इनकार
मेरी अपेक्षा कि ऐसे मुश्किल वक़्त में जितनी हो सके, मेरी मदद करेगा -- ख़त्म हो चुकी थी। मुझे sympathy नहीं, empathy की उम्मीद थी।
वह भी जाती रही, और अब ये हाल था, empathy भी नहीं, तुम बात की seriousness समझ कर स्वार्थी मांगे न करो, दोबारा चोट पहुंचाने वाली हरकत न करो, तो भी बहुत !!
यह सब .. कैसे समझाती?
"तुम नहीं समझ सकते", मैंने आख़िरी कोशिश की।
"आप न... Fever की गोली ले लो, दर्द के लिए pain killer भी ले लो, और दूसरे हाथ से खेल लेना, या फूल चुन लेना। थोड़ा घूमोगी तो दर्द भी भूल जाओगी। .... और अब मुझे बहुत बोर हो रहा है। थोड़ा ग़ुस्सा भी।
I am disappointed...ये क्या है यार, मैं एंजॉय करने आया था और आप भी न ...."
Wow.
मैं अवाक थी!
Adolescence..... वह Netflix वाली मशहूर सीरीज़ याद आ गई, जिसमें एक teenage बच्चा मर्डर के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार है, जहाँ सभी सोचते हैं .. इनोसेंट है but turns out its Adolescence.
वही सिरीज़ जिसका पूरा एक घंटे का एपिसोड एक शॉट में शूट होता था।
ठीक इसी live एपिसोड तरह ..?
जो प्रॉब्लम ही बूझ नहीं समझ सकता, उस बालमन में यह "सूझ" कहाँ से आई?
उसे कैसे सूझा ... fever की गोली, pain killer, और फ्रेश हवा, वगैरह!?
सूझ है, तभी तो बूझना आया होगा।
Was he in ignorance,
Or,
Was I ignorant all along of his disguised ignorance ?
और.. फिर वही हुआ। मैं जब जब चुप हो जाती, वह सोचता मैं उसकी पिछली बात मानने लगी हूँ।
"दवा कहाँ रखते हो? क्रोसिन मैं देता हूँ ", उसने पूछा.. मेरे पास शब्द नहीं थे। My silence continued.
ठोकर खाकर गिरना, चोट लगना : और, अब, सम्भल कर चलना।
Literally and metaphorically.
एक ठोकर कई सबक सिखाती है!
सचमुच नासमझ कौन था?
Ignorant कौन था?
असली बालमन किसका था?
वह सत्य जो innocence और ignorance के नक़ाब में दिखा ही नहीं, वह ज़ख्म के साथ आप ही प्रकट हो गया।
वह सही था। मैं ही ग़लत थी।
चोट खाना, heal होने में वक़्त लगाना, अंत में मेरी ही अकाउंटेबिलिटी है न?
अपने दर्द पर बैठ कर रोना तो है, मगर कब तक?
तब तक, जब तक ख़ुद को victim मानती रहूंगी।
तब तक victim होती रहूंगी, जब तक अन्यायी के साथ रहूंगी।
Offender से करुणा की उम्मीद की ही क्यों जाती है? करुणा होती तो offence ही नहीं होता। .
Abra ca dabra कहने से हीलिंग नहीं हुई न?
तो दूसरे की चोट, ज़ख्म, दर्द देखकर, offender में करुणा जागेगी, यह abra ca dabra, यह मैजिकल बदलाव आए, यह मेरी अतिशयोक्ति नहीं?
हाँ, एक रोज़ वह करुणा समझेगा, दर्द की संजीदगी जानेगा .. तब ... जब दर्द उसे हो। ............
Everything was clear.
मेरा निर्णय हो चुका था। मैंने जवाब दिया ...
"Awww, सो सॉरी ... तुम्हारी बोरियत मैं समझ सकती हूँ।
तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरी हीलिंग हो न हो,
मुझे तुम्हें entertain करना ज़रूरी है न!?
I will definitely do something for you.
चलो बाहर चलते हैं, लेकिन पार्क नहीं। एक छोटीसी ड्राइव पे जाएंगे।
वहाँ किसी cafe में तुम्हें अच्छी सी cold coffee पिलाऊंगी। ठीक है न?"
"ओके... ओक्के!" वह ख़ुश हुआ ... चलने के लिए उत्सुक, तैयार।
वह ड्राइव और कोल्ड कॉफ़ी के सपने देख रहा था। .. और मैं यह सोच रही थी, .. यह रिश्ता dead end पर है .. it's time to breakup with this adult with an adolescent heart. घर के पास पहुंच जाएंगे तब बता दूँगी - 'You are a big baby and I am not set out to mother you-। I'm sorry, इट्स ओवर बिटवीन अस.'
यह सोचकर मैंने कार की चाबी उठाई, और उसे पूछा
"ड्राइव तुम करोगे न?"
"Of course. Don't I always?" कहकर उसने मुझसे चाबी ली और
lock को unlock कर दिया।
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31/03/2026
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"G l a s s e s"
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Those fireflies buzzin’ in your garden
Can’t light-up Your sun-shine
but they sure will glow when YOU are dark
Then
Into the bottle of your desire
as you cheerfully catch and treasure them . hold 'em up, admire them
will you realize
"Glasses"
What’s GLowing to brighten your dark
are A*ses !
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
सर्वस्व एकरस, अखण्ड और अद्वितीय है; उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। ज्ञाता वही, ज्ञेय वही, और ज्ञान भी वही एक है।
आम आदमी इसे कैसे समझे ?
— द्वैत-अद्वैत के सिद्धान्तों का अध्ययन कर लेने पर, उपनिषदों-पुराणों-शास्त्रों में पाण्डित्य अर्जित कर लेने पर, भगवद्गीता कंठस्थ कर लेने पर,
परायणों-परिक्रमाओं-कर्मकाण्डों के अनुष्ठान के पश्चात् भी यदि इस सत्य का अंशमात्र भी बोध न हो सके, .. यह कैसी विडम्बना है?
सत्य की अनुभूति तो दूर .... जहाँ दैनिक जीवन के दुःख-दर्द रत्ती भर भी कम न हुए हों,
वहाँ मनुष्य अगले दिन के संकट से जूझने हेतु हनुमान-चालीसा रटें.. या ब्रम्ह-पूर्ण-अपूर्ण के चिन्तन में प्रवृत्त हो ? —यह प्रश्न स्वाभाविक है।
व्यावहारिक चिंता पेट्रोल, गैस और बढ़ते दामों की है |
मंदिर में 101 परिक्रमा करके धर्मिक duty की छुट्टी कर, आर्थिक duty पर लग जाना तर्कबद्ध है | मगर - उचित है ?
इन शारीरिक-मानसिक दैत्यों, I mean, द्वैतों से निवृत्त होने का अवकाश मिले, तब ही तो आध्यात्मिक द्वैत-अद्वैत-नद्वैत पर मन स्थिर हो सके—है न?
Humans ... बुद्धिजीवी.... जो जीवन को केवल eat -sleep -reproduce - enjoy तक सीमित न मानकर उसके परे “कुछ और” की सम्भावना स्वीकारते हैं; जो प्रश्न उठाते हैं
—जिस पड़ोसी ने कभी रोज़ा नहीं रखा, नमाज़ नहीं पढ़ी, वह पडोसी समृद्ध कैसे?
उस office colleague ने कभी गीता का अध्ययन नहीं किया --- नरकचतुर्दशी पर स्नान नहीं किया, वह जीवन में संतुष्ट कैसे? . जिन्होंने यह सब किया, वह फिर भी दुखी क्यों ?
और वह जिन्होंने सर्वस्व त्यागकर वैराग्य धारण किया, वह इतने सुखी और जीवन्मुक्त कैसे?
ईश्वर और हम - मटका और मिट्टी, गहना और सोना—जब ये पारम्परिक उपमाएँ भी ईश्वर के बोध में अपर्याप्त साबित हुईं
तब आधुनिक युग के प्रश्नकर्ताओं ने नए दृष्टान्तों की खोज की।
वैज्ञानिक प्रगति ने अज्ञान के आवरण में कहीं-कहीं प्रकाश की रेखाएँ उकेरीं।
द्वैत-अद्वैत को एक उदाहरण से थोssssडासा समझते हैं |
अपना हाथ उठाइए और हथेली, उँगलियों को देखिये।
किसी एक उँगली को आसपास किसी वस्तु पर रखकर स्पर्श का अनुभव कीजिए।
स्पर्श क्या है? काया से centralized brain तक प्रवाहित होती एक संवेदना । जिस उँगली ने स्पर्श किया, अनुभव उसी ऊँगली तक सीमित रहा; शेष उँगलियाँ अप्रभावित रहीं।
जबकि हाथ एक ही है, मस्तिष्क भी एक ही है, और मनुष्य भी एक ही!
फिर एक उँगली के स्पर्श का अनुभव दूसरी को क्यों नहीं होता? nervous system ने यह विभाजन क्यों रखा?
क्योंकि यदि एक का स्पर्श सबमें अनुभव होने लगे, तो एक का दर्द भी सबमें व्याप्त होगा। पाँव में चुभा काँटा समस्त शरीर में असह्य पीड़ा भर देगा—जीवन दुष्कर हो उठेगा।
यद्यपि शारीरिक पीड़ा अवयवों में बँटी हुई हैं, मगर सीख "सम्पूर्ण मनुष्य" ग्रहण करता है। अतः जिसकी उँगली एक बार जली हो, उसका पैर भी ज़रासी आंच से दूर हट जाता है—है न?
सत्य भी कुछ ऐसा ही है। हम सभी परमात्मा के अवयव हैं—मानो उसकी उँगलियाँ। एक ही हाथ के अंश, एक ही देह के विविध विस्तार।
कहीं किसी शास्त्र में यह उल्लेख भी मिलता है न —फलाँ जीव दाहिने हाथ से उत्पन्न हुआ, फलाँ बाएँ से, फलां ह्रदय से निकला, विष्णु की नाभि से कमल और ब्रम्हा — या big bang को ही ले लीजिये |
इसीलिए आपका घुटनों का दर्द मुझे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता;
छोटे भाई की कोहनी पर लगी चोट की जलन मुझे नहीं होती
सहेली के ब्रेक-अप, या परिजनों के संघर्ष का दुःख .. मुझे वैसा नहीं स्पर्श करता, जैसा उन्हें करता है।
हाँ—करुणा अवश्य होती है; उनके दुःख के लिए दुःख होता है -- अर्थात - पाँव जानता है कि ऊँगली के जलने पर दर्द हुआ था |
हम सब उँगलियों के समान प्रतीत होते हैं—अलग-अलग। यही पृथकता का बोध द्वैत है।
उँगली, हाथ, शरीर—सब एक ही सत्ता के विविध आयाम हैं—यही अद्वैत है।
उसी प्रकार, इस विश्व का प्रत्येक जीव, निर्जीव, वस्तु और पंचमहाभूत—सब एक ही सत्य की अभिव्यक्ति हैं। भिन्नता तो केवल अज्ञानजन्य आभास है
—अविद्या है।
जिसे यह विद्या प्राप्त होती है, वही वास्तविक अर्थ में बुद्धिमान कहलाता है—न कि केवल UPSC या IIT की उपलब्धियों से। शास्त्रों में जिन बुद्धिमानों का वर्णन है, वे यही अनुभवी जन हैं।
“बुद्धिमान मेरा भजन करते हैं”—यहाँ ‘भज’ धातु का अर्थ है ‘जुड़ना’ —उँगली का हाथ से, हाथ का देह से, और देह का उस परम चेतना से संयोग।
अतः सम्पूर्ण सत्य, ब्रह्म या निर्वाण का बोध यही है—
जिसका प्रतिपादन ईशावास्योपनिषद करता है—
वह (ब्रह्म) पूर्ण है; यह (सृष्टि) भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
|| मंगल हो||
16/03/2026
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An Ensemble: The Drama of the Extras
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Did you know ?
You are not the main character
of your own story.. ?
Yeah. Sorry, you're not the Hero.
Your story gets scripted
Your movie gets filmed
By every character that finds a place on your screen
You dance with every "Extra" dancer Who finds a front spot in your camera
And YOU become the Extra
Every passerby gets dialogues as if
Everyone is the protagonist
But you
Like a C grade movie
The plot of your story thins and thins
With character after character comin'
Until this veneer tears off
Unveiling your true face
That YOU exist NO WHERE
in your own movie
The movie falls at box-office
with a thud!
But
You still have one audience left
That One viewer
Who watched this tragedy turn
"A comedy of errors"
The Viewer who stayed back till
"The End"
The viewer who denied to be
A part of your "Drama of The Extras"
Became your sole Audience
Only to annouce to you
"You are not the main character
of your own movie" ..thus stealing away the last spotlight too
With this final item number
The last dance that plays
during your closing credits!
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