Deepak Kumar

Deepak Kumar

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06/12/2023

गांवों में अमीरी तो नहीं थी, किंतु यह सही है कि आज से तीस वर्ष पूर्व ‘बेरोजगारी’ शब्द का नाम तो मैंने भी नहीं सुना था।
यह पोस्ट पठनीय है।

सैकड़ों वर्ष पुरानी बात है।

अनपढ़ों का एक गाँव था। सभी के पास कोई न कोई स्वरोजगार था, खेती थी, बाग थे, बगीचे थे। उनके घर कच्ची मिट्टी के बने थे परन्तु सभी के पास अपने घर थे।

ब्राह्मण पूजा-पाठ कराते और क्षत्रिय जमींदार थे। वैश्य व्यापार करते, लोहार लोहे का धन्धा, स्वर्णकार सोने के गहने का काम, कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते, बढ़ई लकड़ी का काम करते, कहार मछली पकड़ने का काम करते, बारी पत्तल बनाते, भड़भूँजे अनाज भूनते, हरिजन चमड़े का कार्य करते, तंबोली पान की भीठ का कार्य करते, माली फूलमालाएं बनाते, वाल्मीकि समाज सफाई का काम करते थे।

इस प्रकार सभी के पास कोई न कोई रोजगार था।

पूरा गाँव बड़े आराम से जीवन यापन करता था। पूरा गाँव
धन-धान्य से समृद्ध था और उस गाँव में कोई भी गरीब नहीं था।

एक दिन उस गाँव में एक पढ़ा लिखा व्यक्ति रहने आया। वह सारे दिन कुछ ना कुछ पढ़ता और लिखता दिखाई देता था।

लोगों की समझ में नहीं आता था कि वह करता क्या है ?

लेकिन फिर भी लोग उसका बहुत सम्मान करते थे क्योंकि वह विलायत से बहुत महँगी डिग्री लेकर आया था।

एक दिन उसने गाँव के सभी लोगों को बुलाया और बोला कि तुम लोग भी पढ़ना-लिखना सीख लो।

फिर तुम्हें भी खेती,मज़दूरी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

गाँव वाले सहर्ष सहमत हो गए और कुछ ही दिनों में सभी पढ़े-लिखे हो गए।

अब सभी दिन भर बैठकर कुछ ना कुछ पढ़ते-लिखते रहते थे।

दिन भर बैठे-बैठे कोई न कोई कुछ न कुछ लिखता रहता और फिर दूसरे को पढ़ाता।

फिर दूसरा व्यक्ति अपना लिखा उसे पढ़ने के लिए देता।

सभी लोग अपने-2 काम धंधे छोड़कर सारे दिन कुछ ना कुछ पढ़ते लिखते रहते थे।

इस प्रकार शीघ्र ही उस गाँव के सारे कामधंधे बंद हो गये और कुछ ही दिनों में वह गाँव पढ़े लिखे बेरोजगारों के गाँव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

अंततः, गरीबी, भुखमरी, प्रायोजित महामारी और प्रायोजित सुरक्षा कवच की चपेट में आकर कुछ ही वर्षों में ये सभी पढ़ेलिखे बेरोजगार जीवन-मरण के चक्र से भी मुक्ति पा गए।

आज भी जब पढ़े-लिखों को बेरोजगार भटकते देखता हूँ। बिकते हुए नेता, अभिनेता, पत्रकार, डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट्स और सरकारें देखता हूँ,उजड़ते हुए खेत, खलिहान, बाग और बगीचे देखता हूँ,कटते हुए वृक्ष और फैलते हुए कंक्रीट के जंगल देखता हूँ, तो याद आ जाता है मुझे वह प्राचीन लुप्त हो चुका पढ़े-लिखे बेरोजगारों का गाँव।

08/10/2023

यार देखो भारत बदल तो रहा है ...एक चंद्रयान 2 चाँद पर पहुँचने से ठीक पहले फेल होता है तो पूरा देश एक साथ रोता है...फिर वही चंद्रयान 3 जब चाँद पर तिरंगा गाढ़ता है तो पूरा देश एक साथ आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए गर्वित होता है ..हरियाणा के सोनीपत के एक छोटे से गाँव से एक अंकित बैयांपुरिया इंस्टाग्राम पर उठता है पूरा देश उसके साथ खड़ा हो जाता है उसके 75 हार्ड चैलेंज को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेता है...और 75 दिन में ही देश उसे इतना प्यार देता है कि देश का प्रधानसेवक भी उसकी पीठ थपथपाने उसे बुला लेता है.... Asian games में हम 100 पार जा चुके हैं...इस बात की जितनी ख़ुशी है उस से ज्यादा इस बात की ख़ुशी है कि ये मैडल चुनिंदा प्रतिस्पर्धाओं में नहीं बल्कि बहुत ही डायवर्स स्पोर्ट्स में आये हैं...जो साफ़ बताता है कि सही मौका और सही सिस्टम मिले तो भारत की ये युवा पीढ़ी कॉन्फिडेंस से भरी हुई है।।।

कनाडा खालिस्तान मुद्दे पर हीरो बनने की कोशिश करता है तो डिप्लोमसी से ऐसा जवाब मिलता है कि मन बस मुस्कुरा कर रह जाता है...रूस और अमेरिका के बीच में भारत का अपने हित को चुनना अपने आप में वैश्विक पटल पर आत्मनिर्भर भारत की दस्तक है....Covid में देशवासियों को बचाने से लेकर पूरे विश्व में वैक्सीन मैत्री से भारत ग्लोबल साउथ में अपनी धाक जमा ही चुका है.

यही वो बदलाव हैं जिन्हें देखने में कई पीढ़ियां लगती हैं, लेकिन एक सौभाग्यशाली पीढ़ी को ही ये बदलाव देखना नसीब होता है , सांस्कृतिक वैभव धीरे धीरे स्थापित हो ही रहा है, जो जो खोया था वो वो वापस धीरे धीरे पा ही रहे हैं, भगवान् करे बस नज़र न लगे , 1000 साल की वेदना है, इस बार ऐसे उठ खड़े होंगे कि सारी कसर ही निकाल लेंगे.. ❤️

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27/09/2023

हाँ मम्मी टिकट कंफर्म हो गयी थी, शीट पर ही बैठ कर आया हूँ। पहुँच गया हूँ।
आपने जो खाना पेक करके दिया था वही खाये हैं बाहर का कुछ नहीं खाया। बाहर का तीखा खाना भी नहीं खाया है। रात को भी सादा खाना ही खाऊंगा। हाँ इस बार पिछली बार की तरह बस स्टैंड की बेंच पर नहीं सोया हूँ। होटल में कमरा लिया है,500 में मिल गया है। ज्यादा महंगा नहीं है।
ठीक है मम्मी अब में सो रहा हूँ, सुबह पेपर है।

ऐसा बोल कर एक 23 - 24 सालिया लड़का 5 रुपये के बिस्कुट खा के पानी गटक कर बैग को सिरहाने रख कर कल रात को पार्क की बेंच पर सो गया।

🙂
ये लड़के भी न ☺️


🙂🙃

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