ASTRO RAMAN JHAMB
इस जीवन में इंसान का गुरु वह स्वयं ही होता है क्योंकि केवल वो और उसकी अन्तर आत्मा ही ये जानती है कि अपनी दिनचर्या में उसने क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया है। जिसको साथ लेकर वह अपने जीवन में आगे बढ़ता है और उसे वैसे ही परिणामों से मुलाकात करनी पड़ती है।
21/06/2026
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*रमन झांब, फाजिल्का*
*94654-18696*
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*विश्व योग दिवस पर विशेष*
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*शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग एक अनमोल औषधि है*
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यह बात हम सभी जानते है कि हमारा भू-भाग कितना विशाल है। यहां प्रत्येक के प्राणी अपनी अलग-अलग बुद्धि के साथ-साथ वास करते है। बुद्धि, सोच और ज्ञान का दायरा भले ही एक जैसा ना हो किन्तु परमात्मा ने इस देह को चलाने के लिए सबको एक जैसे तत्त्व दिये हैं। हिन्दू हो या मुसलिम, सिक्ख हो ईसाई अग्नि, हवा, पानी, वायू, आकाश आदि जैसे तत्त्व की आवश्यकता, तो हर धर्म के प्राणी को है। आज संसार का प्रत्येक व्यक्ति शांति चाहता है। विश्वभर में मानव जो भी कार्य करता है, उसका मात्र एक ही लक्ष रहता है कि उसे सुख मिले। समय बीतने के साथ हर कोई शांति स्थापित करने के लिए यतन करता है, परन्तु सम्पूर्ण शांति कैसे स्थापित हो, यह आज भी चिंता का विषय है। क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है, जिस पर बिना किसी रोक-टोक के चल सकें। जिस से किसी भी राष्ट्र की ऐकता और अखण्डता खंडित न हो और न ही किसी का निजि स्वार्थ हो। जिस को प्रत्येक देश का व्यक्ति अपना सकें और अपने जीवन में सुख-शांति का आंनद प्राप्त कर सकें? हां है- एक एैसा मार्ग जिस पर हर कोई निडऱ हो कर चलके शांति प्राप्ति कर सकता है और वो मार्ग है महार्षि पतांजलि द्वारा दर्शाया गया अष्टांग योग का मार्ग क्योंकि यह कोई मत, पंथों या धर्मो के लिए नहीं किया जाता। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग एक अनमोल औषधि है। काया को निरोग रखना किसे अच्छा नहीं लगेगा।
योग शब्द को वेदों, उपनिषदों, गीता और पुराणों में प्राचीन काल से ही प्रयोग में लाया जा रहा है। आत्म दर्शन और समाधि से लेकर, कर्म क्षेत्र तक योग का विस्तार पूर्वक प्रयोग हमारे शास्त्रों में बताया गया हैं। प्रमाण, विपरयय, विकल्प, निद्रा और समृति जब यह पांच विधि प्रवृतियां अभ्यास और बेराग आदि साधनों से मन से निकल जाती हैं और मन, आत्मा के स्वरूप की अवस्था में चला जाता है, तब योग होता है। योग का अर्थ सुचेतना और चेतना के मुख्य केंंद्र परम-चेतंनय ईश्वर के साथ मिलाप हो जाता है। भारतीय विचारधार में गीता का अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत के आधुनिक संतों द्वारा गीता के योग का प्रचार विश्वभर में किया है। गीता में भगवान श्री कृष्ण योग को अलग-अलग अर्थो में बताते है। अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिधि-असिधि, सफलता-असफलता, हार-जीत इन सभी हालातों में मन की स्थिति एक जैसी ही हो, उसे योग कहते है। नि:स्वार्थ भावना ओर कुशलतापूर्वक कर्म करने को गीते में योग कहा गया है। इसके अतिरिक्त जिन साधनों से आत्मा की सिधि ओर मोक्ष की प्रप्ति होती है, उसे योग कहते है।
*योग का अर्थ:-* अपनी चेतना, अपनी सीमा और अपने दायरे का ज्ञान। अपने अन्दर की शक्तियों को विकसित करके परम चेतन्न आत्मा का साक्षात दर्शन और पूर्ण आंनद की प्राप्ति। इन योग क्रियाओं कि अलग-अलग किसमों का विधान हमारे ऋषि-मुनियों ने किया है। यहां हम मुख्य अष्टांग योग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रतियाहार, धारना, ध्यान और समाधि के अन्तर आने वाले आसनों और प्राणायाम के बारे करेगें। इन सभी क्रियाओं से हमारी सोई हुई चेतना में जाग्रति होती है, मरे हुये तन्तू दुबारा जाग जाते हैं। शरीर में एक नई ताज़गी का आगमन होने के साथ-साथ रक्त नाडिय़ों भी ठीक ढंग से चलने लगती है। इंसान रोगों से मुक्ति पाकर निरोग हो जाते हंै। फेफड़ों के अन्दर ताजी हवा का प्रवेश होने से फेफड़े के स्वस्थ होने दमा, सांस अलर्जी आदि से राहत मिलती है, साथ ही दिल को भी राहत मिलती है। योग क्रिया चर्बी कम भी करती है। वजन कम होने से शरीर निरोगी, सुन्दर, सुडोल और मजबूत बनता है। अष्टांग योग के प्रतिदिन अभ्यास से इंसान तामसी बुद्धि को छोड़ सात्विक बुद्धि में प्रवेश पाता है। मानव को परमात्मा से मिलने का मार्ग मिल जाता है।
योग साधनों में अष्टांग के साथ-साथ मुद्राओं का विशेष महत्त्व है। मुद्रएं, आसनों को विकसित रूप है। आसनों में इंद्रियों की प्रधानता और प्राणों की सुरक्षा है। जबकि मुद्राओं में इंद्रियों की सुरक्षा व प्राणों की प्रधानता होती है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड पांच तत्वों से बना है और हमारा शरीर भी पांच तत्वों पर ही निर्भर है। हाथों की पांचों ऊंगलियों में पांच तत्वों का स्थान है। अंगूठा- अग्नि, तरजनी- वायु, मध्य- आकाश, अनामिका- धरती, कनिष्ठा- जल तत्त्व है। इन पांचों की अवस्था बिडने से ही रोग उत्पन्न होते है।
*आइए जाने हस्त मुद्राएं:-*
*1. ज्ञान या ध्यान मुद्रा:-* अंगूठे और तरजनी प्रथम ऊंगली के आगे वाले हिस्से को मिलाकर, शेष ऊंगलियां सीधी रखने से ज्ञान या ध्यान मुद्रा बनती है। *लाभ:-* इस मुद्रा से सम्रण शक्ति बढ़ती है। इसके लगातार अभ्यास से बच्चे तेजस्वी बनते है।
*2. वायू मुद्रा:-* तरजनी (प्रथम ऊंगली) अंगूठे के ऊपर लगाकर अंगूठे से हल्का दबाकर और शेष ऊंगलियां सीधी रखने से वायू मुद्रा बनती है। *लाभ:-* इस से वायू विकार, जोड़ों के दर्द, गैस और रक्त का प्रवाह ठीक चलता है।
*3. शून्य मुद्रा:-* इस मुद्रा में मध्य (बड़ी) ऊंगली को अंगूठे की जड़ में लगाकर, अंगूठे से हल्का दबाए। *लाभ:-* इस से कान का बहना, कान दर्द, कम सुनाई देना आदि जैसे रोगों से मुक्ति मिलती है। कम सुनने वालों को इसे रोज एक घण्टा करना चाहिए।
*4. प्रथ्वी मुद्रा:-* अनामिका (रिंग फिंगर) ऊंगली को अंगूठे के आगे वाले भाग से मिलाएं और शेष ऊंगलियां सीधी रखने से इस मुद्रा को किया जाता है। *लाभ:-* वजन कम होना और मोटापा आदि जैसे रोगों से राहत मिलती है।
*5. प्राण मुद्रा:-* इस मुद्रा में कनिष्ठका (चींची), अनामिका (रिंग फिंगर) और अंगूठे के अगले भाग को मिलाकर की जाती है। एक बात का ध्यान रखे कि हर मुद्रा में शेष ऊंगलियों को सीधा ही रखना है। *लाभ:-* शरीर में तन्दरूस्ती, फूरती और आंखों की रोशनी बढ़ती है।
*6. अपान मुद्रा:-* मध्य (बड़ी) ऊंगली, अनामिका (रिंग फिंगर) और अंगूठे के अगले हिस्से को मिलाकर इसे प्रयोग में लाया जाता है। *लाभ:-* बवासीर, शूगर, गुर्दे, और दांतों के रोग ठीक् होते है। *सावधानी:-* इस मुद्रा से लघु शंका (पिशाब) ज्यादा होती है।
*7. अपान वायू मुद्रा:-* न:-6 की अपान मुद्रा और न:-2 की वायू मुद्रा के मिलान से अपान वायू मुद्रा का जन्म होता है। *लाभ:-* जो दिल के कमज़ोर है उन्हें इसे मुद्रा प्रतिदिन करनी चाहिए।
*8. सूर्य मुद्रा:-* अनामिका (रिंग फिंगर) ऊंगली को अंगूठे की जड़ से मिलाकर उसे अंगूठे से दबाये। *लाभ:-* हाज़मा ठीक रहता है। *सावधानी:-* शरीरिक तौर पर कमज़ोर व्यक्ति इसे न करें।
*9. वरूण मुद्रा:-* कनिष्ठा (चींची) ऊंगली को अंगूठे से जोड़ कर रखे। *लाभ:-* चमड़ी चमकीली और मुलायम होती है।
*10. लिंग मुद्रा:-* दोनों हाथों को जोडक़र बायें हाथ के अंगूठे कों सीधा रखें। *लाभ:-* जिनका बल्ड प्रैशर घटता हो, उनके लिए लाभकारी है।
*11. धारणा शक्ति मुद्रा:-* यह मुद्रा वायु मुद्रा से मिलती है लेकिन इस में सांस को थोड़ी देर तक रोक कर रखना पढ़ता है। *लाभ:-* ऊर्जा का संचार होता है और सांस लेने में कोई परेशानी नहीं आती।
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21/06/2026
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20/06/2026
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*94654-18696*
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*‘आसन’ और ‘सिंहासन’ में कोई अन्तर नहीं होता*
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*‘13 स्वरों’ और ‘26 व्यजंनों’ के मेल से शब्दों का जन्म होता है,* जिनको आगे-पीछे, उपर-नीचे जोडऩे से वाणी को रूप मिलता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के मुख से निकल कर उसके व्यवहार को दर्शाती है क्योंकि शब्दों के सुनने, बोलने और लिखने से ही इंसान को पूर्णता मिलती है और इन्हीं की ही वजह से, इंसान चाहे कैसा भी हो, अगर वो चाहे, तो अपने जीवन को सार्थक कर सकता है/महान बना सकता है फिर उसके लिए किसी विशेष स्थान पर आने की आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि ‘आसन’ और ‘सिंहासन/ऊंचा आसन’ में कोई अन्तर नहीं होता, मात्र इतना ही फर्क है कि भूमि पर कपड़ा विछाकर बैठना या फिर अन्य किसी उचित स्थान पर किसी व्यक्ति को बिठाना आसन और स्वर्ण-जडि़त वस्तुओं एवं अन्य सबसे, उच्चे स्थान पर बैठना सिंहासन कहलाता है। मुसलमान लोग जिस वस्त्र को ज़मीन पर बिछाकर नमाज़ पढ़ते हैं, उसे ‘मुसल्ला’ कहते हैं। दोनों ही जगहों पर बैठे व्यक्ति का एक ही कार्य होता है, सामाजिक और धार्मिक कर्म करते हुये अपनी मर्यादाएं बनाये रखना। दोनों ही स्थानों पर बैठ कर जब एक जैसे कल्याणकारी कार्य किये जाते हैं, तो आसन और सिंहासन में अन्तर शून्य/समाप्त हो जाता है यदि हम यह मान कर चलें कि आसन पर बैठ कर ही ज्ञान मिलता है या ईश्वर की प्राप्ति होती है, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता, क्योंकि उच्च स्थान पर विनम्र होकर बैठकर भी परमात्मा के चरणों में जगह बनाई जा सकती है। हमें अक्सर ही सुनने को मिलता रहता है या फिर हम स्वयं भी इन बातों को प्रयोग में लाते हैं कि यह तो कोई साधु पुरूष है, जिस ने सांसारिक पदार्थो का त्याग कर परमात्मा को पाया है, लेकिन हम यह क्यूं नहीं सोचते कि हमें भी ईश्वर ने विवेक/ज्ञान दिया है, जिस का सहारा लेकर हम इन पदार्थो के बीच रहकर भी भगवान के दर्शन कर सकते हंै। स्थान (पद) इतना महत्त्व नहीं रखता, जितना व्यक्ति के व्यवहार से उसकी पहचान बनती है। इंसान का किरदार उसके जीवन में स्वयं के साथ-साथ, समाज में भी बहुत बड़ी अहमियत रखता है, इस लिए यदि आपको जीवन में कोई ऊंचा पद हासिल हो भी जाये या हासिल हुआ भी है, तो अपनी सोच को एक समान लेकर, जीवन में अपने व्यवहार को प्रमाणित करना भी ज़रूर सीखें। ज़रूरत से ज्यादा खाया गया ‘अन्न’, स्वास्थ्य बिगाड़ देता है और ज़रूरत से पाया गया ‘धन’ बुद्धि को बिगाड़ देता है।
समय परिवर्तन शील है, हर क्षण, हर सैकेंड में बदलता रहता है। इस लिए आज के युग में ऐसी बातों के सफल होने की उम्मीदें बहुत कम होती हैं क्योंकि आसन और सिंहासन दोनों ही त्याग और कुर्बानियां मांगते हंै, दोनों का ही संबंध बलिदान से है। तन पर मात्र एक अंग वस्त्र रख कर भक्ति की लह में ढूब जाने वाला व्यक्ति भी सांसारिक मोह को त्याग चुका होता है और सिंहासन पर बैठकर अपनी जिम्मेदारियों को बाखूबी निभाने वाला भी अनमोल वस्तुओं की इच्छा नहीं रखता। जीवन की सफलता कहीं दूर नहीं है, ये आपके इर्द-गिर्द ही है लेकिन हम इसे हासिल करने के लिए खुद में परिवर्तन लाना पसंद नहीं करते। सूर्य पहले भी वैसा ही निकलता था, जैसे कि आज, चन्द्रमा के प्रकाश को लोग आज भी पहले की भांति ही महसूस करते हैं, बदला कुछ नहीं, लेकिन बदल गया सब कुछ। जीवन के आड़े-टेड़े, मार्ग को हमने स्वीकार करना ज्यादा जरूरी समझ रखा है। जिस के कारण जीवन में अशांति ने अपना घेरा बना लिया और सहनशीलता ने हम से मित्रता तोड़ दी है। जीवन को समझें, आसन भी आपके लिए है और सिंहासन भी आप के लिए ही है, बस बैठना आना चाहिए और सोच में भी समानता आनी चाहिए।
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20/06/2026
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