Dr. Rajeev Raj
19/06/2026
आर.के.एस. अकैडमी की स्थापना (25 वाँ साल) की कहानी
मेरा मानना है कि शिक्षक किसी पद या ज़िम्मेदारी को नहीं, बल्कि मानवीय गुणों से समृद्ध व्यक्तित्व को कहते हैं। ज़रूरी नहीं कि अध्यापन कार्य हेतु नियुक्त सभी लोग सच्चे शिक्षक हों और यह भी क़तई ज़रूरी नहीं कि जो लोग किसी अन्य व्यवसाय में निरत हैं, वे शिक्षक नहीं हो सकते।
जाने-अनजाने कब मेरे मन में शिक्षक बनने का सपना अंकुरित हुआ, पता नहीं। लेकिन किशोरावस्था से यौवन की दहलीज़ तक आते-आते मैंने सदैव यही चाहा कि एक शिक्षक के रूप में जाना जाऊँ। विद्यार्थी जीवन से ही विभिन्न प्रतिष्ठित स्कूलों में लगभग १० वर्षों के अनुभव के बाद मैंने सरकारी शिक्षक होने का गौरव हासिल किया।
प्राइवेट स्कूलों में प्रबंधन/प्रशासन के निर्देशों की सीमाओं में रहकर शिक्षण में जो प्रयोग करना संभव नहीं हो पा रहा था, उन्हें करने की थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता मिली तो राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने का सपना साकार हुआ। महामहिम राष्ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी द्वारा एक शिक्षक के रूप में पुरस्कृत होना मेरे जीवन की सार्थकता का प्रमाण कहा जा सकता है।
तमाम शिक्षण संस्थानों के अनुभवों के आधार पर मैंने पाया कि हमारे शहर में स्कूलिंग की शुरुआत करने वाले बच्चों की मनोविज्ञान समझने वाले स्कूल नहीं हैं। और तब सन् २००३ में इटावा जिले का
पहला रियल प्ले-वे स्कूल शुरू हुआ — आर.के.एस. फाउंडेशन अकैडमी।
इसका उद्देश्य था कि बच्चों को परिवार से कुछ घंटों के लिए अलग होने की प्रक्रिया को सहज और रुचिकर बनाया जाए तथा एक ऐसा वातावरण दिया जाए जिसमें बच्चे की जिज्ञासा स्वतः जागृत हो और बच्चा धीरे-धीरे सीखने की प्रक्रिया में शामिल हो सके।
शहर में पहली बार किसी स्कूल के हर कमरे की दीवारें, छत और फर्नीचर चित्रों तथा रंग-बिरंगे दृश्यों से सजाए गए थे। दिल्ली से विशेषज्ञ पेंटर बुलाकर एक वास्तविक रियल प्ले-वे स्कूल बनाया गया। शहर भर से लोग इसे देखने आते थे।
किसी भी नए विचार या प्रयोग के साथ जो होता है, वही हमारे स्कूल के साथ भी हुआ। “सिर्फ़ खेल खिलाने से क्या होगा, कुछ पढ़ाओ-लिखाओ भी तो फीस देते भी ठीक लगे” जैसे जुमले हावी हुए। परिणामस्वरूप हमें बीच का रास्ता निकालना पड़ा और प्रयोगात्मक तथा पारंपरिक शिक्षण पद्धति में समन्वय स्थापित करना पड़ा।
और फिर स्कूल का नाम हुआ — आर.के.एस. अकैडमी, विजय नगर, इटावा।
🙏 आगे की कहानी अगले अंक में 🙏
Etawah इटावा
RKS Aacademy A Play School विजय नगर इटावा
17/06/2026
लोकतंत्र का मतलब नियमित, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी चुनाव है, जिसमें जनता सरकार बदल सकती है। Adam Przeworski का प्रसिद्ध वाक्य है: “Democracy is a system in which parties lose elections.” यानी सच्चा लोकतंत्र तब है जब सत्ता पक्ष हार भी स्वीकार करे और विपक्ष को मौका मिले। एक पार्टी का dominance (प्रभुत्व) गलत नहीं, अगर वह वोटों से हासिल हो और संस्थाएं (न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव आयोग) स्वतंत्र रहें।
भारत वर्ष में स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक कांग्रेस का एक-पार्टी प्रभुत्व (one-party dominance) था। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि के समय में यह सामान्य था। लेकिन 1967, 1977 (इमरजेंसी के बाद हार) और 1989 के बाद गठबन्धन युग शुरू हुआ। जिसे लोकतन्त्र पर पहली चोट कहा जा सकता है। परस्पर विरोधी विचारधारा के दल सत्ता हासिल करने के लिए जनता की पसंद-नापसंद को दरकिनार करते हुए एक साथ सरकार चलाते हैं और सिर्फ़ व्यक्तिगत हितों को साधते हैं।
2014 और 2019 में BJP ने अकेले बहुमत हासिल किया। लेकिन 2024 में बहुमत गंवाया फिर भी गठबंधन के दम पर सत्ता बरकरार रखी। बीजेपी का मिशन-2047, एक पार्टी प्रभुत्व बनाने और येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की ज़िद ही है। एक पार्टी प्रभुत्व लोकतन्त्र को (sweet poison) मीठा ज़हर देकर आम जन-जीवन को किस हद तक बर्बाद कर सकता है, ये प. बंगाल के हालात देखकर आसानी से समझा जा सकता है जहाँ स्वतंत्रता के बाद से लगातार 25 साल कांग्रेस, लगातार 34 साल लेफ्ट और लगातार 15 साल टीएमसी सत्ता में रही। हालाँकि 1977 चुनाव में इन्दिरा गाँधी का हार जाना और 2024 चुनाव के बाद बीजेपी की सीटें घट जाना जहाँ एक ओर लोकतन्त्र की ताक़त दिखा रहा है वहीं दूसरी ओर वर्तमान समय में बीजेपी की operation lotus (या कमल ऑपरेशन) रणनीति के तहत AAP के 7 राजसभा सांसदों का (Raghav Chadha सहित) BJP में शामिल होना, TMC के 20 लोकसभा सांसदों का विद्रोह कर विलय का ऐलान करना एक पार्टी प्रभुत्व की ज़िद पूरी करने के रूप में देखा जा रहा है। ये घटनाएँ भारतीय लोकतंत्र के लिए किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं कही जा सकतीं।
ग़ौरतलब है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थितियों यथा संस्थाओं का कथित कमजोर होना (मीडिया, विपक्ष पर दबाव, ED/CBI का इस्तेमाल), धार्मिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक मुद्दे आदि के मद्देनज़र कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स (V-Dem, Freedom House, EIU Democracy Index) भारत को “flawed democracy” या “electoral autocracy” श्रेणी में रखती हैं।
ऐसे में देश के जागरूक नागरिकों को निजी स्वार्थ, धर्म और व्यापार से परे रहकर आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए मज़बूत संवैधानिक और आदर्श लोकतान्त्रिक परिवेश के निर्माण में योगदान देना ही होगा और दिनकर जी की इन पंक्तियों में निहित चेतावनी को समझना होगा -
*समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।*
*जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।*
Good Morning Everyone
Following Love
नयन क़ीमती हीरे
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