Tirath Raj
"सकल कला सब विद्या हिनू,
कवि न होऊं नहीं बचन प्रबीनू
सत्य कहऊं लिखि कागद कोरें
कबित विवेक एक नही मोरें"
~ विद्वान कवि की बात दुहराने की साहस करता हूं।
07/01/2026
बॉलीवुड की विद्या बालन ने हाल ही में एक बयान में कहा कि मंदिर में दान देने से बेहतर है हॉस्पिटल को दान देना। बात सुनने में तार्किक लग सकती है—बीमार की सेवा निस्संदेह पुण्य का कार्य है। लेकिन यहीं से सवाल शुरू होता है, खत्म नहीं।
सवाल यह नहीं है कि #हॉस्पिटल को दान सही है या नहीं। सवाल यह है कि यह ज्ञान और नैतिकता अचानक सिर्फ मंदिर के संदर्भ में ही क्यों जागती है?
जब बात चर्च या जीसस की आती है, तब यही तर्क, यही विवेक, यही “प्रैक्टिकल अप्रोच” कहीं गायब क्यों हो जाती है?
भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं।
मंदिर—
•शिक्षा चलाते हैं
•अस्पताल चलाते हैं,गौशालाएँ, अनाथालय, धर्मशालाएँ संभालते हैं
•आपदा के समय सबसे पहले राहत पहुँचाते हैं
लेकिन बॉलीवुड के एक बड़े वर्ग को मंदिर दिखता है तो केवल घंटी और दान पेटी,और चर्च दिखता है तो सेवा,प्रेम और मानवता। चयनात्मक बुद्धिजीविता का सवाल,यदि दान का उद्देश्य मानव सेवा है, तो यह बात—मस्जिद के चंदे पर क्यों नहीं कही जाती? चर्च को मिलने वाले अरबों के फंड पर क्यों नहीं उठती? वेटिकन की अपार संपत्ति पर क्यों चुप्पी रहती है? हर बार नैतिक उपदेश हिंदू संस्थाओं को ही क्यों दिए जाते हैं? यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक चयनात्मक #नैरेटिव है—
जहाँ हिंदू आस्था को पिछड़ा, अवैज्ञानिक और सुधार योग्य बताया जाता है,और बाकी सबको स्वतः प्रगतिशील मान लिया जाता है। आस्था व्यक्ति की निजी पसंद है। कोई मंदिर में दान दे, कोई #अस्पताल में—यह उसका अधिकार है। लेकिन जब कोई सार्वजनिक मंच से यह संकेत देता है कि मंदिर में दान देना कमतर है,
तो यह सेवा का प्रचार नहीं, आस्था का अपमान बन जाता है। यदि विद्या बालन वास्तव में मानवता की बात कर रही हैं,
तो उन्हें यह भी कहना चाहिए था कि– “जहाँ भी पारदर्शी और ईमानदार सेवा हो—वहाँ दान दीजिए,चाहे वह मंदिर हो, मस्जिद, चर्च या अस्पताल।”जीसस की करुणा,प्रेम और सेवा पर किसी को आपत्ति नहीं। क्या #राम, #कृष्ण, #बुद्ध, #महावीर—मानवता के प्रतीक नहीं थे?क्या सेवा, दान और त्याग भारत की आत्मा नहीं रहे?फिर हर बार हिंदू आस्था को ही “सुधारने” की जिम्मेदारी बॉलीवुड क्यों उठाता है?यह मुद्दा दान का नहीं, दृष्टिकोण का है। सेवा का नहीं, चयनात्मक उपदेश का है। भारत को उपदेश नहीं, ईमानदारी चाहिए।आस्था पर तंज नहीं, संतुलित सोच चाहिए।
और सबसे ज़रूरी यदि आप सच में मानवता की बात करते हैं,
तो सभी #आस्थाओं के साथ एक जैसा व्यवहार करना भी सीखिए।
योगीजी जैसा मुख्यमंत्री होना.... उत्तरप्रदेश वासियो के लिए गर्व की बात है!
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