The Message
अमन का पैगाम इन्सानियत के नाम
‘‘हे नबी![सल्ल०] कहो, हे किताब वालो, आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है। यह कि हम अल्लाह के सिवाए किसी की बन्दगी न करें, उसके साथ किसी को शरीक... न ठहराएं, और हममें से कोई अल्लाह के सिवाए किसी को अपना रब (उपास्य) न बना ले। इस दावत को स्वीकार करने से यदि वे मुँह मोड़ें तो साफ़ कह दो, कि गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (केवल अल्लाह की बन्दगी करने वाले) हैं।’’ कुरान आले इमरान 3:64
23/06/2026
इस हदीस का मतलब: यह हदीस बताती है कि रसूलुल्लाह ﷺ को अल्लाह तआला ने हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत की ख़बर पहले ही दे दी थी। जब हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कर्बला की मिट्टी दिखाकर बताया कि हुसैन (रज़ि.) इसी सरज़मीन में शहीद किए जाएंगे, तो रसूलुल्लाह ﷺ अपने प्यारे नवासे की आने वाली मुसीबत और शहादत को याद करके ग़मगीन हो गए।
यह हदीस हमें सिखाती है कि: • हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मक़ाम बहुत बुलंद था। • रसूलुल्लाह ﷺ को अपने अहले बैत से गहरी मोहब्बत थी। • कर्बला का वाक़िआ इस्लामी तारीख़ का एक बड़ा और दर्दनाक हादसा है। • मुसलमानों को अहले बैत से मोहब्बत और उनका एहतराम करना चाहिए।
मुख्तसर नोट: "जब रसूलुल्लाह ﷺ को हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत की ख़बर दी गई, तो आप ﷺ ग़मगीन हो गए। यह नबी ﷺ की अपने नवासे से गहरी मोहब्बत और हज़रत हुसैन (रज़ि.) के महान मक़ाम को बयान करता है।" [📖 मुस्नद अहमद: 26684]
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22/06/2026
इस हदीस में जिन "दो बड़े मुसलमानों के गिरोह" का ज़िक्र है, उनसे मुराद: हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके समर्थक (मुख्यतः इराक़ के लोग)
हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके समर्थक (मुख्यतः शाम/सीरिया के लोग)
हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत (40 हिजरी) के बाद हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़लीफ़ा बने। उस समय मुसलमानों के बीच राजनीतिक मतभेद और गृहयुद्ध की स्थिति थी। यदि लड़ाई जारी रहती तो बहुत अधिक मुसलमानों का ख़ून बहता।
ऐसे समय में हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उम्मत की भलाई और मुसलमानों की एकता को अपनी व्यक्तिगत सत्ता से अधिक महत्व दिया। उन्होंने ख़िलाफ़त से दस्तबरदार होकर हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ सुलह कर ली। इसके परिणामस्वरूप मुसलमानों की आपसी लड़ाई रुक गई और उम्मत एक नेतृत्व के तहत एकजुट हो गई।
यही वह घटना थी जिसकी भविष्यवाणी रसूलुल्लाह ﷺ ने वर्षों पहले इस हदीस में की थी: "मेरा यह बेटा (नवासा) सरदार है, और अल्लाह इसके माध्यम से मुसलमानों के दो बड़े गिरोहों के बीच सुलह करा देगा।" [📖 सहीह अल-बुख़ारी: 2704]
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की महानता और दूरदर्शिता को बयान किया। बाद में उन्होंने अपनी ख़िलाफ़त छोड़कर मुसलमानों की एकता को बचाया और दो बड़े मुस्लिम समूहों के बीच सुलह करवा दी। इसी कारण उन्हें उम्मत के महान मेल-मिलाप कराने वालों में गिना जाता है।
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