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03/06/2026

✈️ विमानन क्षेत्र को राहत, लेकिन सड़क परिवहन क्षेत्र की अनदेखी क्यों?

देश की अर्थव्यवस्था में ट्रक, बस, टैक्सी और स्कूल ट्रांसपोर्ट संचालकों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लाखों परिवार सीधे इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, फिर भी परिवहन व्यवसाय लगातार बढ़ती लागत, महंगे डीज़ल-पेट्रोल, टैक्स, सीएनजी, परमिट शुल्क और विभिन्न प्रशासनिक बोझों का सामना कर रहा है।

जब भी किसी बड़े कॉर्पोरेट या विशेष उद्योग को राहत पैकेज, कर छूट या अन्य सरकारी सहायता की खबर आती है, तब सड़क परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के मन में एक सवाल उठना स्वाभाविक है—

~ क्या छोटे और मध्यम परिवहन संचालकों की समस्याएँ सरकार की प्राथमिकता नहीं हैं?

स्कूल वाहन संचालक, टैक्सी चालक, ट्रक मालिक और छोटे परिवहन व्यवसायी वर्षों से मांग कर रहे हैं कि:
✅ ईंधन पर करों में राहत मिले
✅ परमिट और फिटनेस शुल्क को तर्कसंगत बनाया जाए
✅ परिवहन क्षेत्र के लिए विशेष सहायता पैकेज लाया जाए
✅ प्रशासनिक उत्पीड़न और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जाए
देश का परिवहन क्षेत्र केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है।

यदि सरकार बड़े उद्योगों को राहत दे सकती है, तो सड़क परिवहन क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं पर भी समान गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

हम पूछते हैं—क्या नीति निर्माण में सभी क्षेत्रों के साथ समान व्यवहार हो रहा है, या कुछ क्षेत्रों को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है?

RoadTransport

30/05/2026

कभी पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का प्रचार, कभी हाइड्रोजन की बात, कभी अब पानी और एथेनॉल से चूल्हा जलाने का दावा...

सवाल यह है कि नितिन गडकरी परिवहन मंत्री हैं या पेट्रोलियम मंत्री?

देश की सड़कें, पुल और एक्सप्रेसवे उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी हैं। लेकिन आज हालत यह है कि जगह-जगह पुल गिरने की खबरें सामने आ रही हैं। हाल ही में भारी लागत से बने गंगा एक्सप्रेसवे के क्षतिग्रस्त होने की खबरें चर्चा में रहीं, लेकिन जवाबदेही तय करने और निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठाने के बजाय जनता को नए-नए ईंधन प्रयोगों के सपने दिखाए जा रहे हैं।

याद कीजिए, जब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर दावा किया गया था कि इससे पेट्रोल सस्ता होगा, देश की ऊर्जा निर्भरता कम होगी और जनता को राहत मिलेगी। लेकिन आम आदमी आज भी महंगे ईंधन का बोझ उठा रहा है।

दूसरी तरफ वाहन मालिकों के बीच एथेनॉल के कारण इंजन और माइलेज को लेकर लगातार चिंताएं उठती रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल हितों के टकराव (Conflict of Interest) का है।
जब किसी मंत्री के परिवार का नाम एथेनॉल उद्योग से जुड़ता है और उसी समय सरकार एथेनॉल के उपयोग को लगातार बढ़ावा देती है, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता का मतलब यही है कि ऐसे सवालों का स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब दिया जाए।

देश को प्रचार नहीं, जवाबदेही चाहिए।
देश को नए-नए प्रयोगों की घोषणाएं नहीं, मजबूत सड़कें और सुरक्षित पुल चाहिए।

देश को फोटो-ऑप नहीं, जनता के पैसे से बने प्रोजेक्ट्स की गुणवत्ता का हिसाब चाहिए।

कहीं ऐसा तो नहीं कि "ग्रीन फ्यूल" के नाम पर कुछ चुनिंदा कंपनियों का कारोबार चमकाया जा रहा है, जबकि जनता महंगाई, खराब बुनियादी ढांचे और बढ़ते टैक्स का बोझ उठा रही है?

जनता पूछ रही है— सड़कों का मंत्री सड़कों पर कब ध्यान देगा?

26/05/2026

CNG पर महामानव ने 6 रुपये बड़ा दिये हैं!!

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