Pyar ka Jugaad
23/08/2024
फटी सी धोती, और मैला सा कुर्ता पहने एक आदमी भुट्टा। भुज रहा था
अब लकड़ी के कोयले पर भुज रहे भुट्टे की महक ऐसी होती है की जिसके नाक पर जायेगी, उसे खाने पर विवश कर देगी
तो हम इससे कैसे बच सकते थे?
गाड़ी रोक के उतर गए नीचे, और घर के 3 किलो भुट्टा पैक कराया,
लेकिन नाक में जाती भुट्टे की महक सूंघ कर रहा नही गया और मैने चाचा को बोला एक मेरे लिए भी भुज दीजिए
उन्होंने तुरंत जवाब दिया 15 रुपए का एक है हम भी बोल दिए भुजिए
जब तक वो भुजते मैं हिसाब लगता की एक ठेले पर 50 से ज्यादा भुट्टा है तो दिन का कितना कमाते होंगे
गाडित आधा ही लगा था तभी एक लड़का रॉयल एनफील्ड बाइक से आता है, वैसे ही गंदे कपड़े पहने
हाथ में 1 lakah के फोन के साथ
मैने दादा से पुछा पूरा ठेला बिक जाता है ??
उन्होंने कहा सीजन चल रहा इस समय आराम से सब बिक जाता है
मूर्खता पूर्वक मैने बोला की जब 50 बिक जाता है तो और लाइए
जिसपर उन्होंने उस एरिया में खड़े तकरीबन 6 thelo ke ऊपर इशारा किया
और बोला सब मेरा है
फिर मैंने पूछा आप इस सीजन में कमा लेते हैं इसके बाद
उन्होंने बोला 4 बेटे हैं , हमारे गर्मी के महीने में गन्ने का जूस बेचते हैं 20 रुपए ग्लास
बरसात में के भुट्टा बेचते हैं
और सर्दियों में अंडा बेचते हैं।
और 4 बेटे और एक पिता जी मिलकर महीने में लगभग 3 लाख का धंधा करते थे
उन्होंने ये भी बताया की पहले सिर्फ गन्ने के खेत थे और गन्ने को शुगर मिल में भेज देते थे औने पौने दाम पर
फिर मेरी पत्नी की तबीयत खराब हो गई और बच्चे छोटे थे
मैने गन्ने के रस को निकालने की मशीन ली और खुद के खेत के गन्ने को फुटकर बेचना शुरू किया पहले महीने कमाई नहीं हुईं लेकिन धीरे धीरे धंधा बढ़ा
1 से 4 मशीन ली और अब आधा गन्ना मिल में जाता था आधा मशीन पर रस बेचने के लिए
लेकिन फिर ये सीजन सिर्फ 3 4 महीने होता है
उसके बाद काम नहीं था, तो अब हमने सोचा कुछ और करने का
फिर नए सीजन में भुट्टे का कारोबार किया अपने ही खेत में उगाता हूं
मंडी ना लेजाके खुद बेचता हूं
पर जब ये काम एक महीने बाद बंद होगा तब तक सावन भादो खत्म होगा और कुवार लगते ही अंडे का व्यापर शुरू हो जाएगा
4 बेटे हैं 4 को काम करते हैं लेकिन मालिक हम ही है
सबको महीने का जेब खर्च देते हैं , जो ज्यादा माल बेचता है उसको थोड़ा ज्यादा देते हैं
मैने बोला ये तो ऑफिस सिस्टम है, तो वो बोले ऑफिस वाले हम लोग से चुरा के ले गए और हंसने लगे
तभी मैने पूछा और आपकी पत्नी की तबीयत खराब थी वो ठीक हो गई
उन्हें कहा कहां ठीक भईल 2 साल बाद ही चल बसी
पर ना यू बीमार होती ना हम ठेला लगाते,
खुद तो चली गई लेकिन परिवार को समप्पन कर दी
तब तक मेरा भुट्टा भुज चुका था
और मन में एक ध्वन्द्ध चल रहा था, को पढ़ाई के बाद हम लोग नौकरी के लिए मार करते हैं दिन रात हाय हाय करते हैं
अच्छी नौकरी मिलते ही सबसे पहले परिवार से कटते हैं
और सोचते हैं की अच्छी जिंदगी जी रहे
पर वास्तव में अच्छी जिन्दगी क्या है वो आप को सड़क चलते किसी गैर की कहानी सुन कर के हो समझ आएगी
21/08/2024
भारत जब से आजाद हुआ है तब से स्कूल वाले फीस लगातार बढ़ा रहे हैं लेकिन 15 अगस्त और 26 जनवरी पर लड्डुओं की संख्या अभी भी 2 से आगे नहीं बढ़ी
कब स्कूल वाले अमीर होंगे कब दो के बजाए चार लड्डू मिलेंगे पूछता है सारा भारत 🇮🇳🌹🙏
17/08/2024
जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं। इसके बाद नौकरी की खोज शुरू होती है—यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है।
25 की उम्र में विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं—हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है—उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।
इस बीच, हाथ एक-दूसरे से छूट जाते हैं, बातें और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। बच्चा बड़ा होता जाता है और वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या—इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है।
35 साल की उम्र में, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है।
एक एकांत क्षण में, गुजरे दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है।
पचपन की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं रहना।
मैं सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत बोली, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया—हमेशा के लिए।
उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। क्षण भर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?"
ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है?
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है।
Thank you for supporting me
#मेरीलेखनी #हिंदी #प्रेमकहानियां
17/08/2024
बहन बेटियाँ , सावधान
जब कोई रिश्तेदार मामा, चाचा, ताऊ, फूफा, मौसा पड़ोसी, कज़िन भैया आदि प्रकार का रिश्ता किनारे रख कर तुमसे कहने लगे "रिश्ते अपनी जगह ,पर मैं तो तुम्हें अपनी फ्रेंड मानता हूँ।
तुम एक मॉर्डन गर्ल हो आज के ज़माने की तो पुराने टाइप के रिश्ते मत मानो।
"तो अपने माता पिता भाई को बता दो" क्योंकि उनकी नियत में खोट है।
फेसबुक के फ्रेंड किसी फ्रेंडशिप के प्रतीक नहीं हैं । फेसबुक फ्रेंड मतलब फालतू के फ्रेंड, सिर्फ ऑनलाइन हैं ये,
इनसे जिंदगी पर तब तक कोई फर्क नही जबतक असल जिंदगी में न मिलो।।।
अतः फेसबुक पर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को संदेह से न देखो....
पर इनबॉक्स और व्हाट्सअप में वीडियो कोटेशन शेयर करने लगें तो सावधान।
पुरुषों के हथकंडे -
वे तुमसे ऐसे बातें करेंगे कि दर्द आंखों से छलक पड़े
स्वयं को अपनी पत्नी के पिछड़ेपन से त्रस्त दिखाएंगे
खुद हैंडसम बने रह कर जताएंगे कि बहुत पुराने विचारों की पत्नी मिली है,दर्द किससे कहे...
तुम अगर कह बैठी कि मुझसे कहिये, मै हूँ न तो बस तुम्हारा जीवन उनके हवाले हो गया।
पत्नी को बीमार बता सकते हैं
पत्नी के अवैध संबंधों की झूठी बात बता कर सहानुभूति लूटेंगे..
तुम्हें सुंदर और इंटेलीजेंट बता कर काबू करेंगे,
तुम में उन्हें अचानक ऐश्वर्या, सानिया, कल्पना चावला दिखने लगेगी।
तुम्हारी मम्मी - पापा की ज़्यादा केअर शुरू करेंगे,
तुम्हें वो गिफ्ट करना शुरू करेंगे जो पापा नहीं दे सकते
कोई कुछ कहेगा भी नहीं
उनसे रिश्ता ही ऐसा है अचानक गिफ्ट बढ़ जाएं
कपड़े ज़्यादा प्राप्त होने लगें घर आना जाना बढ़ जाये
तुम्हें एग्जाम दिलाने वे स्वयं जाने लगे।
सावधान
कोई पुरुष रिश्ते की आड़ में तुम्हें लूटने की तैयारी में है।
अच्छी नियत वाले भी अलग दिख जाते हैं, सबसे सुरक्षित रहें।।।
माँ - बाप, सगे भाई- बहन के अलावा कोई हितैषी नही!!....
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जयतु सनातन संस्कृति 🙏🕉️🚩
जय मातृशक्ति 🚩🚩🙏
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