Author Raman Kumar Jha
20/02/2026
#इजाजत( हिंदीं कविता )
कभी तुम नही दिखे जहाँ में
देखा ये जग सारा संसार,
सब कहते है तेरा है सब कुछ
फिर कहाँ छुपे हो पालनहार।।
छोड़ गया मुझको अकेला
तोहे ढुंढा बेसूमार
ढुंढे से भी नही मिला तू
सब जग ढुंढा बारम्बार।।
ये जग छोटा तु बडा़ है
कही भी दिख जाओगे
इधर उधर क्यो जाउं मै
यहाँ भी तो आओगे।।
क्यों न आते रे सांवरियाँ
बोलो कब तुम आओगें
अबकी जो न आया छलिया
अपने पास मोहे पाओगे।।
मै ही आ जाता हूँ मोहन
तुम शायद नही आओगे
रमन को ही ईजाजत दे दे
आकर वही मनाएंगे।।
© रमन कुमार झा
# #हिंदीकविता
15/02/2026
#महायोगी
विशाल हृदय आसमान जैसा
दिल मानो धरती समान ,
धुनी रमाये बैठा योगी
अपने धुन मे अंतर्ध्यान।
अविरल बहे गंगा की धारा
लालट सोभे पूर्णिमा चान,
कंठ बिच नागमणि चमके
मानो सहस्त्र सूर्य समान ।
बाघंम्बर आसन पर बैठा
निर्मल बहे निरंतर ज्ञान ,
चारों तरफ आलौकिक किरणे
कैलाश लागे स्वर्ग समान ।
सफेद बर्फ की चादर ओढ़
दशो दिशा में दुर्लभ रंग ,
इन रंगो को दिशा देकर
योगी खुद लागे बेरंग।
यक्ष ,गंधर्व ,देवी ,देवता
झूमे नाचे गाए उमंग,
अद्वितीये दृश्य देखकर
रमन मन हो गया दंग।
दूर दूर सन्नटा पसरा
ओम स्वर गुंजयमान,
अदृश्य शक्ति के आगोश मे
घिरा सारा ब्रह्मांड।
त्रिशूल पर नजर टिकाये
जो आदिशक्ति का धरे ध्यान,
त्रिकालदर्शी, त्रिभुवन पति
तुझे कोटि-कोटि प्रणाम।
जिसे पाने कि चाहत मे
आदिशक्ति बनी तपस्विनी,
अनंत काल तपस्या करके
तपोबल से बनी अर्द्धांगिनी।
हे नाथ अंतर्यामी
तू आरंभ अंत है,
नमन करो स्वीकार महादेव
तू एक और अनंत है।
तीनो लोक का गूढ़ रहस्य
तेरे अंदर बंद है,
सुर ,नर ,मुनी ,देव, देवता
उसी तलाश मे लामबंद है।
हे योगेश्वर हे नागेश्वर
तुही महाकाल है,
भूत, प्रेत, विघ्न, बाधा
रूप तेरा विकराल है।
शीश नवाये खड़ा चरणों मे
चरण वंदना स्वीकार करो,
शरणागत को शरण मे लेकर
मृत्यु लोक से उद्धार करो।।
© रमन कुमार झा
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