Gautam Kumar Priy Rational

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27/04/2026

अर्जक संघ मेरे लिए सिर्फ एक सोच नहीं है, यह मेरे जीवन का उद्देश्य बन चुका है। जब-जब समाज में अंधविश्वास, पाखंड और अन्याय को देखा, तब-तब भीतर से एक आवाज उठी कुछ बदलना है, कुछ करना है।

इसी भावना के साथ हमने सोशल मीडिया के माध्यम से अर्जक संघ के विचारों को लोगों तक पहुँचाने का काम शुरू किया और धीरे-धीरे यह आवाज लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँची।

इस सफर में रास्ते आसान नहीं थे कभी गालियाँ मिलीं, कभी धमकियाँ, कभी मुकदमों का सामना करना पड़ा लेकिन हर बार एक ही चीज़ ने संभाला अर्जक विचारों पर अटूट विश्वास।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो संतोष होता है कि जो बीज बोया था, वह अब एक मजबूत आवाज बन चुका है लेकिन दिल के किसी कोने में एक कसक भी है कि यह आवाज अब जमीन पर भी उतनी ही ताकत से गूंजनी चाहिए। इसलिए अब एक नया संकल्प लिया है अर्जक संघ को सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहने देंगे, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर, हर गांव, हर समाज, हर इंसान तक पहुँचाएंगे।

जिस निष्ठा और ईमानदारी के साथ हमने अर्जक विचारों को करोड़ों लोगों तक पहुँचाया है, उसी ताकत और समर्पण के साथ अब इसे जमीन पर भी करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बनाकर दिखाएंगे। यह सिर्फ एक संगठन नहीं है यह उम्मीद है, यह बदलाव है, यह एक नई सोच की शुरुआत है। संघर्ष अभी बाकी है और यह सफर अब और भी मजबूत होने वाला है।

Photos from Gautam Kumar Priy Rational's post 16/04/2026

जिस महापुरुष ने अपना सम्पूर्ण जीवन अंधविश्वास, पाखंड और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष में समर्पित कर दिया, आज उसी बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर दूध चढ़ाकर उन्हें हिंदू देवी-देवताओं की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है। यह केवल श्रद्धा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है उन्हें उनके मूल विचारों से अलग कर ब्राह्मणीकरण करने की कोशिश।

इतिहास इसका साक्षी रहा है। तथागत गौतम बुद्ध, जिन्होंने वेदों, यज्ञों और कर्मकांडों का विरोध किया, उन्हें भी बाद में विष्णु का नौवां अवतार घोषित कर उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को कमजोर करने का प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप, बौद्ध धरोहरों पर सिंदूर और कर्मकांड थोपकर उनकी मूल पहचान को धूमिल किया गया। आज की ये तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही हैं कि पहले बुद्ध का ब्राह्मणीकरण किया गया, अब बाबासाहेब अंबेडकर को उसी राह पर ले जाने की कोशिश हो रही है।

बाबासाहेब ने स्वयं कहा था मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं। और अंत में उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। उनका जीवन तर्क, विज्ञान, समानता और मानवता का प्रतीक था, न कि अंधविश्वास और कर्मकांड का। दूध चढ़ाना सम्मान नहीं, बल्कि उनके विचारों का अपमान है। यह प्रयास उनके क्रांतिकारी मिशन को कमजोर करने और समाज को फिर से पाखंड की ओर धकेलने का एक माध्यम है।

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