Darul Uloom Razvia

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27/03/2025

عنوان: الوداع کا دن اور ایک بیٹے کی توبہ

رمضان کا آخری جمعہ تھا، جسے جمعة الوداع کہا جاتا ہے۔ پورے شہر میں ایک عجیب سی کیفیت تھی۔ مسجدیں نمازیوں سے بھری ہوئی تھیں، لوگ توبہ و استغفار میں مصروف تھے، اور ہر کوئی رمضان کے آخری لمحات کو زیادہ سے زیادہ عبادت میں گزارنے کی کوشش کر رہا تھا۔

لیکن فہد کے دل میں شدید بےچینی تھی۔ وہ ایک عام نوجوان تھا، دنیا کی رنگینیوں میں کھو چکا تھا۔ نماز، روزہ، قرآن سب کچھ پیچھے رہ گیا تھا۔ اس کی ماں ہمیشہ اسے سمجھاتی، رو رو کر دعائیں مانگتی، مگر وہ ہر بار ٹال دیتا۔

آج جب وہ گھر آیا تو ماں جائے نماز پر بیٹھی آنسو بہا رہی تھی۔ فہد نے بے دلی سے پوچھا،
“امی، آپ پھر رو رہی ہیں؟”

ماں نے نم آنکھوں سے کہا،
“بیٹا! آج الوداع کا دن ہے، رمضان جا رہا ہے۔ اللہ جانے ہم اگلے رمضان تک زندہ رہیں یا نہیں! میں تمہارے لیے دعا کر رہی تھی کہ اللہ تمہیں ہدایت دے دے۔”

یہ سن کر فہد کو ہلکا سا جھٹکا لگا۔ اس نے کبھی یہ بات اس زاویے سے نہیں سوچی تھی۔ ماں نے آگے کہا،
“بیٹا، موت کا کوئی بھروسہ نہیں، کیا پتہ یہ ہمارا آخری موقع ہو؟”

یہ سن کر فہد کا دل کانپ اٹھا۔ جانے کیوں، آج اس کے دل پر ماں کی ہر بات اثر کر رہی تھی۔ ایک لمحے کے لیے اسے اپنے گناہ یاد آئے، وہ راتیں جب وہ فضول کاموں میں ضائع کرتا رہا، وہ دن جب اذانیں ہوتی رہیں مگر اس نے کبھی نماز ادا نہ کی۔

آج مسجد کی طرف جاتے ہوئے اس کے قدم لرز رہے تھے، مگر دل میں ایک عجیب سی روشنی محسوس ہو رہی تھی۔ جیسے ہی اس نے پہلی رکعت کے لیے ہاتھ باندھے، آنسو خود بخود بہنے لگے۔ وہ سجدے میں گیا تو ایسا لگا جیسے برسوں کا بوجھ ہلکا ہو رہا ہو۔

نماز کے بعد وہ ہاتھ اٹھا کر رو پڑا،
“یا اللہ! میں بہت بھٹک گیا تھا، مجھے معاف کر دے۔ میں تیرے در پر آیا ہوں، مجھے ہدایت دے دے۔”

ماں نے جب فہد کو اس طرح توبہ کرتے دیکھا، تو خوشی سے اس کی آنکھوں میں آنسو آ گئے۔ وہ جانتی تھی کہ اللہ نے اس کی دعائیں قبول کر لی ہیں۔

یہ الوداع کا دن تھا، مگر فہد کی زندگی میں نئے سفر کا آغاز تھا۔ وہ رمضان کی آخری ساعتوں میں اپنے رب کی طرف پلٹ آیا تھا، اور شاید یہی اس کے لیے سب سے بڑی رحمت تھی۔

اللہ ہمیں بھی اپنی طرف رجوع کرنے کی توفیق عطا فرمائے اور ہمیں نیک راستے پر چلنے والا بنا دے، آمین۔

25/03/2025

वुज़ू के फ़राइज़ (फर्ज़) चार हैं, यानी ऐसे काम जो वुज़ू में करना अनिवार्य हैं। अगर इनमें से कोई एक भी रह जाए तो वुज़ू नहीं होगा। ये चार फ़राइज़ निम्नलिखित हैं:

1. मुंह धोना – माथे के ऊपर से लेकर ठोड़ी के नीचे तक और एक कान से दूसरे कान तक पूरे चेहरे को धोना।

2. हाथ धोना – कोहनी तक दोनों हाथों को धोना।

3. मसह करना – दोनों हाथों को गीला करके सिर के चौथाई हिस्से पर मसह करना।

4. पैर धोना – टखनों तक दोनों पैरों को अच्छी तरह धोना।

अगर इनमें से कोई भी चीज़ छोड़ दी जाए, तो वुज़ू मुकम्मल (पूरा) नहीं होगा।

19/03/2025

ज़कात का इनाम

गाँव में रहने वाले अज़हर मियाँ एक नेकदिल इंसान थे। अल्लाह ने उन्हें अच्छी रोज़ी दी थी, और वो हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहते थे। हर साल रमज़ान के महीने में वो अपनी ज़कात निकालते और ग़रीबों में बाँट देते।

इस बार जब अज़हर मियाँ ने ज़कात के पैसे अलग किए, तो उनकी छोटी बेटी आयशा ने पूछा, "अब्बू, ये ज़कात क्यों देते हैं?"

अज़हर मियाँ ने प्यार से समझाया, "बेटा, ज़कात इस्लाम का एक अहम हिस्सा है। यह हमारा फर्ज़ है कि हम अपनी कमाई में से ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को दें। इससे हमारा माल पाक होता है और अल्लाह हमसे खुश होते हैं।"

आयशा ने खुश होकर कहा, "तो इस बार हम किसे ज़कात देंगे?"

अज़हर मियाँ ने सोचा और फिर बोले, "गाँव के अनवर चाचा की हालत अच्छी नहीं है। उनका छोटा बेटा बीमार है और उनके पास इलाज के पैसे नहीं हैं। हम उन्हें ज़कात देंगे।"

आयशा को बहुत खुशी हुई। अगले दिन अज़हर मियाँ अनवर चाचा के घर पहुँचे और उन्हें ज़कात के पैसे दिए। अनवर चाचा की आँखों में आँसू आ गए, उन्होंने हाथ उठा कर दुआ दी, "अल्लाह तुम्हें और बरकत दे, तुम्हारी औलाद को सलामत रखे।"

कुछ दिन बाद, जब अनवर चाचा के बेटे की तबीयत ठीक हो गई और उन्होंने मेहनत करके अपना काम फिर से शुरू कर दिया, तो वो अज़हर मियाँ के पास आए और बोले, "भाई, आपकी दी हुई ज़कात ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। अब मैं खुद भी दूसरों की मदद करूँगा।"

आयशा ने खुश होकर कहा, "अब्बू, ज़कात सच में बहुत बरकत वाली चीज़ है!"

अज़हर मियाँ मुस्कुरा दिए और बोले, "हाँ बेटा, जब हम ग़रीबों की मदद करते हैं, तो अल्लाह हमारी मदद करता है।"

सीख:

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ज़कात सिर्फ़ एक फ़र्ज़ नहीं, बल्कि समाज में भाईचारे और मोहब्बत को बढ़ाने का एक ज़रिया भी है। इससे न सिर्फ़ ग़रीबों की मदद होती है, बल्कि देने वाले के माल और दिल में भी बरकत आती है।

18/03/2025

सदके का फायदा

एक बार की बात है, एक नेक और ईमानदार व्यापारी था। वह हमेशा गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करता और अल्लाह की राह में सदका देता था। उसका मानना था कि सदका देने से कभी कोई गरीब नहीं होता, बल्कि अल्लाह और ज्यादा बरकत देता है।

व्यापारी की परीक्षा

एक दिन वह व्यापारी समुद्र के रास्ते व्यापार करने निकला। सफर के दौरान अचानक तेज़ तूफान आया और उसकी नाव डूब गई। उसके सारे सामान और धन-दौलत समुद्र में बह गए। वह किसी तरह तैरकर किनारे पहुंचा, लेकिन अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था।

वह बहुत दुखी था, लेकिन फिर उसे याद आया कि उसने हमेशा सदका दिया था। उसने खुद से कहा, "अल्लाह कभी अपने बंदों को निराश नहीं करता। मैं फिर से मेहनत करूंगा।"

सदके की बरकत

वह एक गांव पहुंचा और वहां छोटे-मोटे काम करने लगा। कुछ दिनों बाद उसने एक बीमार बुजुर्ग की मदद की, जिसे उसके परिवार ने अकेला छोड़ दिया था। वह उसकी सेवा करता रहा, बिना किसी लालच के।

कुछ महीनों बाद, वह बुजुर्ग ठीक हो गया और उसने व्यापारी से कहा, "मैं बहुत अमीर आदमी हूं, लेकिन मेरा कोई वारिस नहीं है। तुमने मेरी सेवा की है, इसलिए मैं अपनी सारी जायदाद तुम्हें देना चाहता हूं।"

इस तरह, व्यापारी फिर से दौलतमंद बन गया। उसने समझ लिया कि सदका देने से कभी नुकसान नहीं होता, बल्कि अल्लाह उससे कई गुना ज्यादा वापस देता है।

सीख:

सदका देने से इंसान कभी गरीब नहीं होता।

अल्लाह अच्छे कामों का बदला हमेशा बेहतर तरीके से देता है।

नेक नीयत और सब्र से हर मुश्किल आसान हो जाती है।

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