Abhinaw Raman
09/11/2025
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग के दो दिन बाद, सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र के शीतलपट्टी गांव में वीवीपैट मशीनों से निकली पर्चियां कूड़े के ढेर में पाई गईं। यह घटना भारतीय लोकतंत्र की नब्ज पर एक गहरा आघात है, जो चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। यह कोई मामूली चूक या प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि एक ऐसा systemic failure है जो देश के मतदाता के विश्वास को तार-तार करने के लिए काफी है। इस घटना ने न केवल स्थानीय चुनावी राजनीति को विषैला बना दिया है, बल्कि पूरे देश में ईवीएम-वीवीपैट प्रणाली की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह घटना महज एक 'तकनीकी गड़बड़ी' या 'लापरवाही' का मामला नहीं रह गई है। यह एक गंभीर संवैधानिक संकट का सूचक है। वोटिंग के दो दिन बाद वीवीपैट पर्चियों का कूड़े में पाया जाना साबित करता है कि चुनाव प्रक्रिया का अंतिम और सबसे संवेदनशील चरण - मतगणना - एक गहरे अनियमितता के दायरे में काम कर रहा है। मॉक पोल के नाम पर होने वाली यह ट्रेनिंग एक ढोंग बनकर रह गई है, जहाँ प्रक्रिया का पालन करने के बजाय उसे दिखावा मात्र बना दिया गया। महागठबंधन द्वारा निर्वाचन आयोग पर उठाए जा रहे सवाल निराधार नहीं हैं। आयोग की भूमिका पर यह सवाल क्यों नहीं उठना चाहिए कि जिस प्रक्रिया की निगरानी का दायित्व उस पर है, वह इतनी भयावह रूप से कैसे विफल हो गई?
इस घटना की सबसे भयावह बात यह है कि यह मतदाता के मत की गोपनीयता और पवित्रता के सिद्धांत को सीधे तौर पर चोट पहुँचाती है। वीवीपैट पर्ची यह सुनिश्चित करने के लिए है कि मतदाता को पता चले कि उसका वोट सही ढंग से दर्ज हुआ है। लेकिन जब यही पर्ची कूड़े के ढेर में मिले, तो इसका मतलब है कि मतदाता की निजता का उल्लंघन हुआ है। क्या किसी मतदाता की पसंद कचरे का टुकड़ा है? क्या लोकतंत्र की यही कीमत है? यह घटना एक डीप स्टेट की तरह काम कर रही तंत्र की ओर भी इशारा करती है, जहाँ संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से मुख मोड़ रही हैं।
समस्तीपुर के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का मौके पर पहुंचना और जांच के आश्वासन देना, इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं है। यह एक रूटीन प्रशासनिक कार्यवाही प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य जनाक्रोश को शांत करना भर है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में किसी उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन होगा? क्या दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी? या फिर यह मामला भी फाइलों की भीड़ में दबकर रह जाएगा? इतिहास गवाह है कि ऐसे मामलों में 'जांच चल रही है' का बयान आम बात होती है, पर नतीजा कुछ नहीं निकलता।
यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी है। अगर समय रहते चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। निर्वाचन आयोग को न केवल इस घटना की गहन जांच करनी चाहिए, बल्कि पूरे देश में ईवीएम और वीवीपैट के प्रबंधन और सुरक्षा के लिए एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करनी चाहिए। जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है, और इस पूंजी को इस तरह कूड़े के ढेर में नहीं फेंका जा सकता।