BObaka
18/04/2026
वन के शांत, पवित्र वातावरण में अग्नि की मंद लपटें जल रही थीं। उस दिव्य दृश्य में स्वयं महादेव और माता अन्नपूर्णा मानव जीवन के एक अत्यंत सरल, अपितु गहन रहस्य को प्रकट कर रहे थे।
कथा कहती है कि एक बार भगवान शिव ने जगत को यह उपदेश दिया कि यह संसार मात्र माया है, यहाँ तक कि अन्न भी माया है। जब यह बात माता पार्वती ने सुनी, तो उन्होंने सोचा—यदि अन्न ही माया है, तो जीवों का पालन कैसे होगा? तब माता ने अन्न की शक्ति को जगत से अदृश्य कर दिया। परिणाम यह हुआ कि समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया, कोई अन्न नहीं रहा, भूख ने देवताओं और मनुष्यों को व्याकुल कर दिया।
तब स्वयं महादेव को अपनी बात का वास्तविक अर्थ समझ में आया। वे काशी नगरी में भिक्षुक बनकर पहुँचे, जहाँ माता पार्वती अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं। उस दिन माता ने स्वयं अपने हाथों से भगवान शिव को अन्न परोसा। यह वही क्षण था जब शिव ने स्वीकार किया कि अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं, अपितु यह साक्षात् देवी शक्ति का प्रसाद है।
यह चित्र उसी दिव्य लीला का प्रतीक है—जहाँ शिव, जो स्वयं विश्व के संहारक हैं, अन्न के महत्व को समझते हुए विनम्र भाव से उपस्थित हैं, और माता अन्नपूर्णा सृष्टि के पोषण की अधिष्ठात्री बनकर प्रेमपूर्वक भोजन बना रही हैं। अग्नि पर चढ़े पात्र, साधारण वन का परिवेश, और देवी-देवताओं का यह सहज रूप हमें यह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी साधना भी अंततः अन्न और करुणा से ही पूर्ण होती है।
अन्न केवल भोजन नहीं, अपितु जीवन का आधार है। जिस घर में अन्न का सम्मान होता है, वहाँ लक्ष्मी और शांति का निवास होता है। और जहाँ अन्न का तिरस्कार होता है, वहाँ अभाव अपने आप आ जाता है।
॥ स्तोत्र ॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
माता अन्नपूर्णा हमें केवल अन्न ही नहीं देतीं, अपितु ज्ञान, संतोष और समृद्धि का आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। इस दिव्य कथा का स्मरण हमें यह सिखाता है कि हर अन्न का कण ईश्वर का प्रसाद है—उसे श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम से ग्रहण करना ही सच्ची भक्ति है।
नमामीशमीशान
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