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18/08/2025
गाँव के उस छोटे से घर में दादी और उनका पोता आरव रहते थे। आरव की माँ-बाप शहर में काम करते थे और साल में बस कुछ ही बार गाँव आते। ऐसे में आरव का पूरा संसार उसकी दादी ही थीं। दादी उसके लिए माँ भी थीं और सबसे अच्छी दोस्त भी।गाँव के उस छोटे से घर में दादी और उनका पोता आरव रहते थे। आरव की माँ-बाप शहर में काम करते थे और साल में बस कुछ ही बार गाँव आते। ऐसे में आरव का पूरा संसार उसकी दादी ही थीं। दादी उसके लिए माँ भी थीं और सबसे अच्छी दोस्त भी।
दादी सुबह सूरज उगने से पहले उठ जातीं और चूल्हे पर उसके लिए गरम दूध बनातीं। आरव कभी-कभी शिकायत करता, “दूध में मिठास नहीं है दादी!” और दादी मुस्कुराकर कहतीं, “बेटा, मिठास तो तुम्हारी मुस्कान में है।” आरव खिलखिलाकर हँस पड़ता।
दिनभर दादी उसे कहानियाँ सुनातीं—कभी रामायण की, कभी अपने बचपन की। आरव उन्हीं कहानियों में खोकर वीर योद्धा बन जाता, कभी राजा तो कभी जादुई परी का दोस्त। शाम को दादी उसे खेतों में लेकर जातीं। धान की बालियों को देखकर आरव पूछता, “दादी, ये पौधे इतने झुके-झुके क्यों रहते हैं?” दादी समझातीं, “बेटा, जैसे-जैसे इंसान में ज्ञान बढ़ता है, उसे और भी विनम्र होना चाहिए, वैसे ही जैसे पके धान के पौधे झुक जाते हैं।”
धीरे-धीरे समय बीतता गया। आरव बड़ा होने लगा और उसकी पढ़ाई के लिए उसे शहर भेजना पड़ा। जिस दिन वह जाने वाला था, दादी ने उसे कसकर गले से लगाया और बोलीं, “बेटा, पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना, लेकिन कभी अपने गाँव और दादी को मत भूलना।” आरव ने सिर हिलाया, पर आँखों में आँसू रोक नहीं पाया।
शहर की चकाचौंध और पढ़ाई के दबाव में आरव धीरे-धीरे दादी को फोन करना भी भूलने लगा। दादी रोज़ दरवाज़े पर बैठकर उसका इंतज़ार करतीं, पर मोबाइल की घंटी शायद ही कभी बजती। पड़ोसी पूछते, “बहन जी, कब आ रहा है आरव?” दादी बस मुस्कुराकर कह देतीं, “जल्दी ही आएगा।” लेकिन उनके दिल में इंतज़ार और गहराता जाता।
सालों बाद, जब आरव अपनी नौकरी और व्यस्तताओं में पूरी तरह उलझ चुका था, तभी उसे खबर मिली कि दादी की तबीयत बहुत खराब है। यह सुनते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह तुरंत गाँव भागा।
घर पहुँचते ही उसने देखा—दादी चारपाई पर लेटी हैं, शरीर बहुत कमजोर हो चुका है, लेकिन जैसे ही उन्होंने आरव को देखा, उनकी आँखें चमक उठीं। काँपते हाथों से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “मेरा बच्चा आ गया...” आरव फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने दादी से कहा, “दादी, माफ कर दो... मैं आपके बिना कितना अकेला था और समझ ही नहीं पाया।”
दादी मुस्कुराईं, “बेटा, प्यार में माफ़ी कैसी? तुमने जो सीखा, वही मेरी जीत है। बस इतना वादा करो, अब कभी इस गाँव और अपनी जड़ों से दूर नहीं जाओगे।”
आरव ने उनकी हथेली थाम ली और सिर झुका दिया।
उस दिन आरव ने समझा—ज़िंदगी की असली दौलत दौलत या नौकरी नहीं
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