History bukhari
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05/03/2026
दुनिया की तारीख़ गवाह है कि अगर किसी एक ख़ानदान को अल्लाह तआला ने सबसे ज़्यादा मक़बूलियत, इज़्ज़त और नबूवत का सिलसिला अता किया, अल्लाह तआला ने आपको इब्राहीम नाम अता फ़रमाया, जिसका मतलब है क़ौमों का बाप। सचमुच, आपकी नस्ल से ऐसी अज़ीम हस्तियाँ पैदा हुईं जिनका नाम क़यामत तक रोशन रहेगा।
आपकी दो बीवियाँ थीं, सारा अलैहिस्सलाम और हाजरा अलैहिस्सलाम। हाजरा अलैहिस्सलाम से आपके पहले बेटे पैदा हुए इस्माईल अलैहिस्सलाम, और सारा अलैहिस्सलाम से पैदा हुए इसहाक अलैहिस्सलाम। इसहाक अलैहिस्सलाम के बेटे थे याकूब अलैहिस्सलाम, जिन्हें इसराईल भी कहा जाता है। याकूब अलैहिस्सलाम की नस्ल से एक के बाद एक नबी तशरीफ़ लाए, यूसुफ अलैहिस्सलाम, मूसा अलैहिस्सलाम, दाऊद अलैहिस्सलाम, सुलेमान अलैहिस्सलाम, और यह सिलसिला चलता रहा यहाँ तक कि ईसा अलैहिस्सलाम तक पहुँचा। दूसरी तरफ इस्माईल अलैहिस्सलाम के बारह बेटे हुए, जिनमें से मशहूर हुए कैदार, और उसी नस्ल से आगे चलकर अदनान पैदा हुए। फिर नस्ल दर नस्ल यह सिलसिला चलता रहा, माज़, नज़ार, मुदर, इलियास, मुद्रिका, खुज़ैमा, किना, नज़र, मालिक, और फिर फिहर जिन्हें कुरैश का असल बुज़ुर्ग माना जाता है। इसी मुबारक नस्ल से आगे ग़ालिब, लुआई, काब, मुर्राह, किलाब, कुसई, अब्द मनाफ, हाशिम, अब्दुल मुत्तलिब, अब्दुल्लाह और फिर दुनिया की सबसे अज़ीम हस्ती, इमामुल अंबिया, खातमुन नबीयीन, रहमतुल्लिल आलमीन, मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तीन बेटे थे, क़ासिम, अब्दुल्लाह और इब्राहीम, और चार बेटियाँ - ज़ैनब, रुकय्या, उम्मे कुलसूम और फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा। यह वह ख़ानदान है जिसे अल्लाह तआला ने नबूवत, रहनुमाई और इज़्ज़त की बुलंदियों से नवाज़ा। अगर यह मालूमात आपको फ़ायदेमंद लगी हो तो इस पैग़ाम को आगे तक ज़रूर पहुँचाइए!
22/02/2026
एक अजीब करिश्मा : कुवैत के मशहूर दाई, शेख अब्दुर्रहमान अस्सुमैत रहिमहुल्लाह को खबर मिली कि अफ्रीका की एक ऐसी बस्ती है जहाँ अभी तक इस्लाम की रोशनी नहीं पहुँची। उनके दिल में दर्द जगा और उन्होंने तुरंत इरादा कर लिया कि वहाँ जाना है। साथियों ने रोकते हुए चिंता के साथ कहा: “आप नहीं जा सकते। हमारे और उस बस्ती के बीच एक नदी है जो मगरमच्छों से भरी हुई है।”
शेख ने पूरी शांति और यक़ीन के साथ जवाब दिया: “मुझे वहाँ ले चलो… जिम्मेदारी मेरी है।” वे लोग नाव में बैठे। नदी में लहरें उठ रही थीं और इधर-उधर से डरावने मगरमच्छ सिर उठाए देख रहे थे। मगर नाव बढ़ती गई और अल्लाह की मदद से वे नदी पार कर गए। जब वे बस्ती पहुँचे तो लोग हैरानी से उन्हें देखने लगे। उन्होंने पूछा: “आप यहाँ कैसे पहुँचे?”
साथियों ने कहा: “अल्लाह ने हमारी हिफाज़त की, क्योंकि हम उसके दीन का पैग़ाम लेकर आए हैं।” शेख अस्सुमैत रहिमहुल्लाह ने बड़ी सादगी और मोहब्बत से उन्हें इस्लाम के बुनियादी अकीदे और तालीमात समझाईं। बात खत्म हुई तो बस्ती के सरदार ने कहा: “हमारी एक शर्त है… अगर आप उसे पूरा कर दें, तो हम सब इस्लाम क़ुबूल कर लेंगे।”
शेख ने मुस्कराकर पूछा, “वह क्या है?”
सरदार ने उदासी से कहा: “हमारी बस्ती में कई सालों से बारिश नहीं हुई। आप अपने रब से दुआ कीजिए कि बारिश हो जाए।” शेख ने कहा: “ठीक है… लेकिन पहले बस्ती के सभी लोगों को इकट्ठा कर लो।” जब पूरी बस्ती मैदान में जमा हो गई, तो शेख ने वुज़ू किया और नमाज़ के लिए खड़े हो गए। रुकू और सज़्दा की लय से माहौल में गहरा सुकून उतर आया। वे एक लंबे सज़्दे में चले गए। सज़्दे में उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उनकी ज़बान पर लगातार यह दुआ थी: “ऐ मेरे रब… अपने दीन को अब्दुर्रहमान के गुनाहों की वजह से रुसवा न करना।”
वे देर तक अल्लाह के सामने रोते रहे। अचानक आसमान में गरज की आवाज़ आई। उन्होंने सज़्दे से सिर उठाया तो रहमत के बादल छाए हुए थे और मोटी-मोटी बारिश की बूँदें बरसने लगीं। जब बस्ती वालों ने यह नज़ारा देखा तो बेइख़्तियार पुकार उठे: “हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके आखिरी रसूल हैं!” शेख अब्दुर्रहमान अस्सुमैत की आँखें नम हो गईं। उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा किया और पूरी बस्ती यक़ीन के साथ इस्लाम में दाखिल हो गई।
ध्यान रहे कि शेख अस्सुमैत एक मेडिकल डॉक्टर थे (Internal Medicine) और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के माहिर। उन्होंने ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल और कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की। लेकिन अपनी पूरी जिंदगी अल्लाह के दीन के प्रचार और लोगों की सेवा में गुजार दी। वे 29 साल अपनी पत्नी के साथ अफ्रीका के सूने इलाकों में घूमते रहे। नतीजा यह हुआ कि 11 मिलियन लोगों ने उनके हाथों इस्लाम कबूल किया। आधुनिक इतिहास में किसी एक व्यक्ति ने इतने लोगों को इस्लाम की रोशनी नहीं दिखाई। उनका विस्तृत तआरुफ़ हमारी किताब “रोशनी के मुसाफ़िर” में दर्ज है। (ज़िया चत्राली)
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بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ١
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